ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतभी है इस अध्यायमें । न रहा कुछ कहनेमें । अब रहा गुरु-शिष्योंमें । स्नेहाचार ॥ ४६ ॥ ऐसे इस विषयकी बात । हो गयी है ज्ञानियोंको ज्ञात । किंतु हुए अन्य आकांक्षित । मुमुक्षुजन ॥ ४७ ॥ ऐसे जो मैं पुरुषोत्तम । ज्ञानसे मिलता सुवर्म । वह सर्वज्ञ मैं औ' सीमा । वही भक्तिकी ॥ ४८ ॥ इस भांति यह त्रिलोक नायक । बोला उस अध्यायका एक श्लोक । तब वहां तोषसे वर्णन एक । किया विज्ञानका ही ॥ ४९ ॥ संसारका एक कौर कर । जीवको एक दृष्टिसे देखकर । आनंद साम्राज्य सिंहासन पर । बिठाया है यह ॥ ५० ॥ उपाय नहीं इतना समर्थ । कहता है देव अन्य यथार्थ । यही एक सम्यक् ज्ञानका नाथ । सभी उपायोंमें है ॥ ५१ ॥ ज्ञान प्राप्तिका उपाय— होते जो आत्म-जिज्ञासु ऐसे । सादर तथा प्रसन्नतासे । उतारते हैं ज्ञान परसे । अपना जीव ॥ ५२ ॥ जिस पर जब प्रेम होता । वही वही सम्मुख है आता । अन्य सबको पीछे हटाता । ऐसे है प्रेमका ॥ ५३ ॥ इसी लिये मुमुक्षु जिज्ञासुओंमें । नहीं करते ज्ञानानुभव अपनेमें । करेंगे योग-क्षेम ज्ञानके विषयमें । स्वाभाविक रूपसे ॥ ५४ ॥ तब है जो यह सम्यकज्ञान । कैसे होगा अपने स्वाधीन । या मिला उसका वृद्धि-यत्न । होगा कैसे ॥ ५५ ॥ या न होने देता जो ज्ञान उत्पन्न । तथा उदित ज्ञानका अप्रयोजन । ऐसे ज्ञान विरुद्धका होना भान । यह आवश्यक ॥ ५६ ॥ फिर ज्ञानका जो प्रतिकूल । दूर करना वह सकल । तथा ज्ञानका जो अनुकूल । करें स्वीकार ॥ ५७ ॥ ६२९ देवासुर-संपद्विभाग-योग