ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिकाल कर भ्रांतिका नग । खड़ा किया है सृष्टिका अंग । पहचाना जाता है जो जग । इस नामसे ॥ ८३ ॥ जो अष्टधा भिन्न ऐसे । दिखाया सातमें जैसे । क्षेत्र-द्वारा छत्तीससे । दिखाया है जो ॥ ८४ ॥ पिछला कहना कितना । इसीमें कहा है अर्जुन । वृक्षाकार रूप कारण । प्रस्तुत यहां ॥ ८५ ॥ यह सब है जो साकार । देह-कल्पनासे नगर । बन गया तदनुसार । चैतन्य आप ॥ ८६ ॥ जैसे कूपमें बन आप ही बिंब । सिंह करता प्रतिबिंबसे क्षोभ । फिर उसी क्षेत्रसे है समारंभ । करता कूदनेका ॥ ८७ ॥ या सलिलमें पूर्वका जो होता । व्योम पर व्योम प्रतिबिंबित । वैसे अद्वैत होकर भोगता । द्वैत आप ॥ ८८ ॥ अर्जुन ! जो इस प्रकार । पुर कल्पनासे साकार । करता आत्मा निद्रा घोर । विस्मृतिकी वहां ॥ ८९ ॥ स्वप्नमें शय्या देख जैसे । स्वप्नमें सो जाते हैं वैसे । नगरमें शयन ऐसे । होता आत्माका ॥ ४९० ॥ फिर वह निद्रा मदमें । सुखी या दुखी माननेमें । अहंकारकी समाधिमें । बकता जाता ॥ ९१ ॥ यह जनक या यह माता । यह पुत्र वित्त तथा कांता । मैं काला गोरा हीन या शास्ता । मेरा है यह सब ॥ ९२ ॥ ऐसे स्वप्नाश्व पर हो सवार । दौड़ता जो स्वर्ग और संसार । उस जीवका नाम धनुर्धर । है क्षर पुरुष ॥ ९३ ॥ अब तू सुन यह पार्थ । क्षेत्रज्ञ है जो कहलाता । या जिसको जीव कहता । सारा विश्व ॥ ९४ ॥ अपना रूप जो भूल जाता । सर्व-भूतत्व अनुसरता । वह चैतन्य है कहलाता । क्षर पुरुष ॥ ९५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६१४