ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षराक्षर पुरुष विचार— श्री कृष्णने फिर बात की । इस संसार नगरकी । बसति है दो पुरुषोंकी । केवल मात्र ॥ ७१ ॥ गगनमें जैसे संपूर्ण । बसते हैं रात औ, दिन । संसार नगरमें मान । वैसे ये दो हैं ॥ ७२ ॥ तीसरा भी एक पुरुष रहता । वह इनका नाम नहीं सहता गांव सह वह इन्हे निगलता । होता जब प्रकट ॥ ७३ ॥ रहने दो तीसरेकी वार्ता । सुनो अब इन दोकी कथा । इस संसार ग्राममें पार्था । बसने आये जो ॥ ७४ ॥ एक है अंधा पगला लूला । दूजा सर्वांग पूर्ण है भला । ग्राम-गुणोंसे संग केवल । हुवा उनका ॥ ७५ ॥ उनमें है एक क्षर । दूसरा जो है अक्षर । दोनोंसे यह संसार । भरा है ठसाठस ॥ ७६ ॥ सुन अब क्षर है कौन । अक्षरका क्या लक्षण । अभिप्राय यह संपूर्ण । कहूंगा तुझको ॥ ७७ ॥ जहां है महदकार । वहांसे हे धनुर्धर । यहां है जो तृणांकुर । वहां तक ॥ ७८ ॥ जो है बड़ा या थोर । चलता या है स्थिर । या जो होता गोचर । मन-बुद्धिसे ॥ ७९ ॥ जो कुछ पंच-भूतसे बनता । नाम-रूपमें आकर फंसता । तथा टकसालसे निकलता । गुणत्रयोंकी ॥ ४८० ॥ शिक्का जो है भूताकृतिका । बनाया जाता जो स्वर्णका । बनता है वह कालका । द्यूत-बीज ॥ ८१ ॥ जानना ही जो विपरीत । तथा जो कुछ होता ज्ञान । वह प्रति-क्षण समाप्त । होता बनके ॥ ८२ ॥ ६१३ पुरुषोत्तमयोग