भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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शार्गधर सुन बोला तब । वही कहने लिये अब । कहने लगा जो दोनों भाग । अपनी उपाधिके ॥ ६२ ॥ भगवानकी उपाधिकता— पूछा था निरुपाधिक । कहता है उपाधिक । ऐसा प्रश्न स्वाभाविक । उठेगा यहां ॥ ६३ ॥ अजी ! छासको अलग करना । कहा जाता मक्खन निकालना । हीन कस धातु सब जलना । स्वर्ण-शुद्धि ॥ ६४ ॥ या काईको दूर करना । विशुध्द जलको पा लेना । तथा बादलोंका हटना । आकाश शुध्द ॥ ६५ ॥ ऊपरसे ढका चोकर । फटकके किया तो दूर । शुध्द अनाजका स्वीकार । होता आप ॥ ६६ ॥ वैसे उपाधि उपाहित । विचारनेसे व्यवस्थित । किसीसे न पूछते ज्ञात । होता निरुपाधिक ॥ ६७ ॥ जिस भांति मौन रहकर । बाला प्यारसे सकुचाकर । पति नाम शब्द मारकर । कहती वैसे ॥ ६८ ॥ जो है न कहने जैसा । कहना पडा है ऐसा । तभी उपाधिसे वैसा । कहता श्रीहरी ॥ ६९ ॥ प्रतिपदाकी चंद्ररेखा । दिखाना हो तो वृक्ष-शाखा । दिखाते वैसे उपाधिका । करते वर्णन ॥ ४७० ॥ द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥ पुरुष लोकमें है दो क्षर तथैव अक्षर । क्षर हैं सब ये भूत अक्षर स्थिर है वह ॥ १६ ॥ ज्ञानेश्वरी ६१२