भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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या डबरा ही भरता सूखता । सूर्य जैसेका वैसा है रहता । वैसे ही शरीर आता औ' जाता । देखते हैं ऐसे ॥ ८७ ॥ घट मठ बनाये । वैसे ही तोड़ दिये । आकाश रह गये । सदा अखंड ॥ ८८ ॥ वैसे अखंड आत्म-सत्ता । तन है जो आता जाता । अज्ञान-दृष्टिसे कल्पित । जानते हैं ज्ञानी ॥ ८९ ॥ चैतन्य न बढ़ता न घटता । वह कर्म न करता कराता । ऐसे आत्म-ज्ञानसे है जानता । शुद्ध-रूपसे ॥ ३९० ॥ तथा स्वाधीन होगा संपूर्ण ज्ञान । प्रज्ञा परमाणुका अंतदर्शन । सकल शास्त्रोंका रहस्य अर्जुन । किसी समय ॥ ९१ ॥ किंतु है ऐसी इसकी उत्पत्ति । मनमें न रही यदि विरक्ति । होती कभी सर्वात्मकी प्राप्ति । विद्वत्तासे ॥ ९२ ॥ मुखमें भरा है सदैव ज्ञान । अंतःकरणमें विषयोंका स्थान । इससे न होगी प्राप्ति अर्जुन । मेरी कभी ॥ ९३ ॥ करनेसे ग्रंथ पठन । टूटेगा भव-बंधन । करनेसे ग्रंथ स्पर्शन । होगा क्या पाठ ? ॥ ९४ ॥ आंखमें पट्टी बांधकर । नाकसे मोति सूंघकर । समझेगा क्या धनुर्धर । उसका मूल्य ॥ ९५ ॥ वैसे चित्तमें अहंताका स्थान । जिह्वा पर शास्त्र संपूर्ण । इससे नहीं होगा मेरा ज्ञान । करोड़ों जन्मोंमें ॥ ९६ ॥ मैं अकेला सबमें भरा हुवा हूं— एक हूं मैं सबमें व्याप्त । भूतमात्रमें हूं समस्त । कहता हूं मैं यही बात । स्पष्ट रूपसे ॥ ९७ ॥ ६०५ पुरुषोत्तमयोग

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