भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥ वैसे सूर्य सह जो संपूर्ण । विश्वकी रचना है अर्जुन । प्रकाश वह मेरा ही जान । आद्यंत है जो ॥ ९८ ॥ जल सोखकर लेता सविता । जलांश जो बादमें है रहता । चंद्रमें रहती है जो पांडुसुता । जोस्ना वह मेरी ॥ ९९ ॥ तथा दहन पचन सिद्धि । करता रहता निरवधि । हुताग्नै वह तेजोवृद्धि । जान मेरी ही ॥ ४०० ॥ गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३ ॥ प्रवेश किया मैंने भूतलमें । तभी यह महासिंधु जलमें । नहीं पिघला है युग-युगमें । मृत्तिका पिंड ॥ १ ॥ तथा भूत ही स-चराचर । धरा है धरतीने अपार । पृथ्वी-तलमें प्रवेश कर । उसको धरा मैंने ॥ २ ॥ गगनमें मैं पांडुसुत । चंद्रके रूपसे अमृत । भरा हुवा मैं स्वचलित । बना सरोवर ॥ ३ ॥ वहांसे निकलते रश्मिकर । उनको धरकर मैं अपार । सभी वनस्पतियोंका आगर । भरता रहता मैं ॥ ४ ॥ इससे सस्यादिक सकल । करते धान्यादिका सुकाल । तथा अन्नादिसे प्रतिपाल । करता सबका ॥ ५ ॥ सकल जन जीवनका जीवन 'वैश्वानर' मैं हूं— ऐसे उत्पन्न किया हुवा अन्न । जिस भांति करके मैं दीपन । जिससे जीवका हो समाधान । करता हूं ऐसे ॥ ६ ॥ सूर्यमें जलता तेज विश्वको है प्रकाशता । चंद्रमें अग्निमें वैसे मेरा ही तेज जान तू ॥ १२ ॥ धृतिके बलसे भूत धरता मैं धरा बना । पोसता वनस्पतीको रससे भर सोम मैं ॥ १३ ॥ ज्ञानेश्वरी ६०६

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