ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४ ॥ प्राणिमात्रके नाभि-कंदपर । अंगीठी बनके पांडुकुमार । जलता हूं मैं दीप्ति बनकर । जठरमें सदैव ॥ ७ ॥ धौंकनी बनाकर प्राणापान । फूंकता रहता हूं रात दिन । पचा डालता मैं कितना अन्न । इसी उदरमें ॥ ८ ॥ शुष्क अथवा स्निग्ध । सुपक्व या विदग्ध । किंतु मैं चतुर्विध । पचाता अन्न ॥ ९ ॥ ऐसे मैं ही हूं सकल जन । जीवनका हूं सार-जीवन । औ' जीवनका मुख्य-साधन । वैश्वानर मैं हूं ॥ ४१० ॥ कहूं क्या इससे अधिक पार्था । मेरी सर्व-व्यापककी कथा । विश्वमें दूसरा नहीं सर्वथा । मेरे बिन कुछ भी ॥ ११ ॥ संसारमें कुछ सुखी और कुछ दुखी क्यों ? - किंतु इसका कारण । सदा सुखी हैं कुछ जन । तथा कुछ दुःख मगन । दीखते यहां ॥ १२ ॥ अजी ! संपूर्ण नगरमें जैसे । दीप जलते एक ही दीपसे । किंतु कुछ जलते उसमेंसे । कुछ बुझते क्यों ? ॥ १३ ॥ यहां करता ऐसा संशय । तेरा मन यदि धनंजय ! अबका है उत्तम समय । संदेह निवृत्तिका ॥ १४ ॥ मैं भर रहा यहां संपूर्ण । इसमें अन्यथा नहीं जान । जिसका जैसा अंतःकरण । दीखता वैसे ॥ १५ ॥ जैसे आकाशध्वनि है जो एक । गूंजता नाद बन अनेक । भिन्न भिन्न वाद्योंमेंसे तू देख । धनंजय ॥ १६ ॥ वैश्वानर बना मैं ही जीवोंके तन में बसा । पचाता अन्न चारो ही प्राण अपान फूंकके ॥ १४ ॥ ५०७ पुरुषोत्तमयोग