भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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या एक सूर्य जैसे अर्जुन । लोक चेष्टासे होकर भिन्न । उपयोग होता अनुदिन । देखता है तू ॥ १७ ॥ नाना बीज धर्मानुरूप । वृक्ष-रस बनता आप । वैसे बदलता स्वरूप । जीवमें मेरा ॥ १८ ॥ जैसे नीलमणिका हार । सर्पत्व लेता भयंकर । सुखद होता निरंतर । जब दूसरेको ॥ १९ ॥ अथवा जैसे स्वातीका उदक । सीपमें मोति औ, व्यालमें विष । वैसे सु ज्ञानियोंको मैं हूं सुख । दुख अज्ञानियोंको ॥ ४२० ॥ सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५ ॥ सबके हृदयमें जो आत्म-स्फुरण है वह मैं हूं— वैसे ही होती हृदय मध्यमें । अमुक हूं ऐसी उर्मी सभमें । वह स्फुरण जो दिन रातमें । होता मैं हूँ ॥ २१ ॥ किंतु संत संगमें होता । या योग-ज्ञानमें बैठता । गुरु-चरण उपासता । वैराग्यसे ॥ २२ ॥ ऐसे ही सत्कर्ममें नित । अज्ञान नष्ट होता पार्थ । उसका होता अहं स्थित । आत्म-रूपमें ॥ २३ ॥ वे अपने आपको देख । पाते मुझ आत्मामें सुख । मेरे बिन भिन्न न देख । कभी कहीं ॥ २४ ॥ सर्वान्तरोंमें करता निवास देता स्मृति ज्ञान विवेक मैं ही । मैं ही अकेला चिर वेद-वेद्य वेदज्ञ मैं वेद रहस्य कर्ता ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६०८

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