ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजी ! होता है जब सूर्योदय । देखता जैसे सूर्यको ही सूर्य । वैसे मेरे ज्ञानका धनंजय । कारण मैं ही ॥ २५ ॥ सबके अज्ञानका कारण भी मैं— या शरीर सेवामें हो तत्पर । संसार गौरवको सुनकर । अहंकार देहमें डूबकर । रहा है जिनका ॥ २६ ॥ वे हैं स्वर्ग संसारार्थ । दौड़ते कर्ममें पार्थ । तथा होते हैं दुःखार्थ । मेरे ही कारण ॥ २७ ॥ यह होता भी है अर्जुन । मेरे कारण है अज्ञान । जागृत ही देखता स्वप्न । या निद्रा लेता ॥ २८ ॥ जिन बादलोंने सूर्यको छिपाया । उसी सूर्यसे बादल देखा गया । मेरे अज्ञानसे वैसे देख लिया । विषय जीवोंने ॥ २९ ॥ जैसे निद्रा या जागृतिका । प्रबोध कारण मूलका । वैसे ज्ञानाज्ञान जीवोंका । कारण मैं हूं ॥ ४३० ॥ जैसे सर्पत्वका कारण डोर । वह डोर ही मूल धनुर्धर । वैसे ज्ञानाज्ञानका व्यवहार । मुझसे होता ॥ ३१ ॥ तभी मैं. जैसे हूं वैसे । मुझको न जाननेसे । वेदके न जाननेसे । उसकी हुई शाखाएं ॥ ३२ ॥ तो भी वेदोंके शाखा-भेदसे । मैं ही एक जाना जाता वैसे । सभी ओरकी नदियां जैसे । मिलती सिंधुमें ॥ ३३ ॥ वैसे महा-सिद्धांतके पास पार्थ । श्रुतियां खो जाती हैं शब्द सहित । अथवा आकाशमें गंध सहित । वायु-लहरियां ॥ ३४ ॥ वैसे हैं समस्त श्रुतिजात । होते लजाकर जैसे शांत । उसका मैं करता यथार्थ । अर्थ प्रकट ॥ ३५ ॥ फिर श्रुति सह जो अशेष । विश्व खो जाता यहां निःशेष । वह निज ज्ञान भी विशेष । जानता मैं ही ॥ ३६ ॥ ६०९ पुरुषोत्तमयोग (77)