भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जैसे निद्रितको कर जागृत । तब न जानता स्वप्नका द्वैत । किंतु करना एकत्व प्रतीत । अपना ही जो ॥ ३७ ॥ वैसे अपना अद्वयपन । जानता हूं मैं द्वैतके बिन । उसका भी हूं बोध कारण । जाननेका मैं ही ॥ ३८ ॥ आगसे मिला कपूर । न राख न वैश्वानर । न रखता धनुर्धर । उसी भांति ॥ ३९ ॥ वैसे समूल अविद्या खाता । वह ज्ञान भी जो डूब जाता । जब नहीं ऐसा न रहता । तब है भी कैसे ॥ ४४०॥ मार्ग सह विश्व ले गया जो अर्जुन । उस चोरको पकड़ेगा कैसे कौन । ऐसी व्यवस्था है जो विशुद्ध तू जान । वह मैं हूँ ॥ ४१ ॥ ऐसी जो जड़ाजड़ व्याप्ति । कहता है कैवल्यपति । अपने रूपकी पूर्ति । निरुपाधिक मैं ॥ ४२ ॥ वह बोध है ऐसा संपूर्ण । बिंबित हुवा पार्थमें जान । नभके पूर्ण-चंद्रसमान । क्षीरार्णवमें ॥ ४३ ॥ या जैसे दर्पणमें बिंबत होता । उसके सम्मुख जो चित्र रहता । वैसे कृष्ण औ' पार्थ अनुभावता । एक ही बोध ॥ ४४ ॥ फिर भी है वह वस्तु-स्वभाव । बढ़ता जाता प्रिय अनुभव । तभी वह अनुभवका राव । कहता अर्जुन ॥ ४५ ॥ कहनेमें अब व्यापकत्व । कहगया निरुपाधिकत्व । प्रसंगवश स्वस्वरूपत्व । कहनेमें देव ॥ ४६ ॥ कहना वह एक बार । पूर्णरूपसे कृपाकर । श्रीकृष्ण यह सुनकर । कहता भला ॥ ४७ ॥ हमको भी पांडुसुता । इसको कहना भाता । किंतु ऐसा प्रश्न कर्ता । मिलता नहीं ॥ ४८ ॥ आज मनोरथका फल । मिला है तू यहां केवल । खुलकर यह सकल । पूछनेको ॥ ४९ ॥ ज्ञानेश्वरी ६१०