ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४ ॥ प्राणिमात्रके नाभि-कंदपर । अंगीठी बनके पांडुकुमार । जलता हूं मैं दीप्ति बनकर । जठरमें सदैव ॥ ७ ॥ धौंकनी बनाकर प्राणापान । फूंकता रहता हूं रात दिन । पचा डालता मैं कितना अन्न । इसी उदरमें ॥ ८ ॥ शुष्क अथवा स्निग्ध । सुपक्व या विदग्ध । किंतु मैं चतुर्विध । पचाता अन्न ॥ ९ ॥ ऐसे मैं ही हूं सकल जन । जीवनका हूं सार-जीवन । औ' जीवनका मुख्य-साधन । वैश्वानर मैं हूं ॥ ४१० ॥ कहूं क्या इससे अधिक पार्था । मेरी सर्व-व्यापककी कथा । विश्वमें दूसरा नहीं सर्वथा । मेरे बिन कुछ भी ॥ ११ ॥ संसारमें कुछ सुखी और कुछ दुखी क्यों ? - किंतु इसका कारण । सदा सुखी हैं कुछ जन । तथा कुछ दुःख मगन । दीखते यहां ॥ १२ ॥ अजी ! संपूर्ण नगरमें जैसे । दीप जलते एक ही दीपसे । किंतु कुछ जलते उसमेंसे । कुछ बुझते क्यों ? ॥ १३ ॥ यहां करता ऐसा संशय । तेरा मन यदि धनंजय ! अबका है उत्तम समय । संदेह निवृत्तिका ॥ १४ ॥ मैं भर रहा यहां संपूर्ण । इसमें अन्यथा नहीं जान । जिसका जैसा अंतःकरण । दीखता वैसे ॥ १५ ॥ जैसे आकाशध्वनि है जो एक । गूंजता नाद बन अनेक । भिन्न भिन्न वाद्योंमेंसे तू देख । धनंजय ॥ १६ ॥ वैश्वानर बना मैं ही जीवोंके तन में बसा । पचाता अन्न चारो ही प्राण अपान फूंकके ॥ १४ ॥ ५०७ पुरुषोत्तमयोग
या एक सूर्य जैसे अर्जुन । लोक चेष्टासे होकर भिन्न । उपयोग होता अनुदिन । देखता है तू ॥ १७ ॥ नाना बीज धर्मानुरूप । वृक्ष-रस बनता आप । वैसे बदलता स्वरूप । जीवमें मेरा ॥ १८ ॥ जैसे नीलमणिका हार । सर्पत्व लेता भयंकर । सुखद होता निरंतर । जब दूसरेको ॥ १९ ॥ अथवा जैसे स्वातीका उदक । सीपमें मोति औ, व्यालमें विष । वैसे सु ज्ञानियोंको मैं हूं सुख । दुख अज्ञानियोंको ॥ ४२० ॥ सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५ ॥ सबके हृदयमें जो आत्म-स्फुरण है वह मैं हूं— वैसे ही होती हृदय मध्यमें । अमुक हूं ऐसी उर्मी सभमें । वह स्फुरण जो दिन रातमें । होता मैं हूँ ॥ २१ ॥ किंतु संत संगमें होता । या योग-ज्ञानमें बैठता । गुरु-चरण उपासता । वैराग्यसे ॥ २२ ॥ ऐसे ही सत्कर्ममें नित । अज्ञान नष्ट होता पार्थ । उसका होता अहं स्थित । आत्म-रूपमें ॥ २३ ॥ वे अपने आपको देख । पाते मुझ आत्मामें सुख । मेरे बिन भिन्न न देख । कभी कहीं ॥ २४ ॥ सर्वान्तरोंमें करता निवास देता स्मृति ज्ञान विवेक मैं ही । मैं ही अकेला चिर वेद-वेद्य वेदज्ञ मैं वेद रहस्य कर्ता ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६०८
अजी ! होता है जब सूर्योदय । देखता जैसे सूर्यको ही सूर्य । वैसे मेरे ज्ञानका धनंजय । कारण मैं ही ॥ २५ ॥ सबके अज्ञानका कारण भी मैं— या शरीर सेवामें हो तत्पर । संसार गौरवको सुनकर । अहंकार देहमें डूबकर । रहा है जिनका ॥ २६ ॥ वे हैं स्वर्ग संसारार्थ । दौड़ते कर्ममें पार्थ । तथा होते हैं दुःखार्थ । मेरे ही कारण ॥ २७ ॥ यह होता भी है अर्जुन । मेरे कारण है अज्ञान । जागृत ही देखता स्वप्न । या निद्रा लेता ॥ २८ ॥ जिन बादलोंने सूर्यको छिपाया । उसी सूर्यसे बादल देखा गया । मेरे अज्ञानसे वैसे देख लिया । विषय जीवोंने ॥ २९ ॥ जैसे निद्रा या जागृतिका । प्रबोध कारण मूलका । वैसे ज्ञानाज्ञान जीवोंका । कारण मैं हूं ॥ ४३० ॥ जैसे सर्पत्वका कारण डोर । वह डोर ही मूल धनुर्धर । वैसे ज्ञानाज्ञानका व्यवहार । मुझसे होता ॥ ३१ ॥ तभी मैं. जैसे हूं वैसे । मुझको न जाननेसे । वेदके न जाननेसे । उसकी हुई शाखाएं ॥ ३२ ॥ तो भी वेदोंके शाखा-भेदसे । मैं ही एक जाना जाता वैसे । सभी ओरकी नदियां जैसे । मिलती सिंधुमें ॥ ३३ ॥ वैसे महा-सिद्धांतके पास पार्थ । श्रुतियां खो जाती हैं शब्द सहित । अथवा आकाशमें गंध सहित । वायु-लहरियां ॥ ३४ ॥ वैसे हैं समस्त श्रुतिजात । होते लजाकर जैसे शांत । उसका मैं करता यथार्थ । अर्थ प्रकट ॥ ३५ ॥ फिर श्रुति सह जो अशेष । विश्व खो जाता यहां निःशेष । वह निज ज्ञान भी विशेष । जानता मैं ही ॥ ३६ ॥ ६०९ पुरुषोत्तमयोग (77)
जैसे निद्रितको कर जागृत । तब न जानता स्वप्नका द्वैत । किंतु करना एकत्व प्रतीत । अपना ही जो ॥ ३७ ॥ वैसे अपना अद्वयपन । जानता हूं मैं द्वैतके बिन । उसका भी हूं बोध कारण । जाननेका मैं ही ॥ ३८ ॥ आगसे मिला कपूर । न राख न वैश्वानर । न रखता धनुर्धर । उसी भांति ॥ ३९ ॥ वैसे समूल अविद्या खाता । वह ज्ञान भी जो डूब जाता । जब नहीं ऐसा न रहता । तब है भी कैसे ॥ ४४०॥ मार्ग सह विश्व ले गया जो अर्जुन । उस चोरको पकड़ेगा कैसे कौन । ऐसी व्यवस्था है जो विशुद्ध तू जान । वह मैं हूँ ॥ ४१ ॥ ऐसी जो जड़ाजड़ व्याप्ति । कहता है कैवल्यपति । अपने रूपकी पूर्ति । निरुपाधिक मैं ॥ ४२ ॥ वह बोध है ऐसा संपूर्ण । बिंबित हुवा पार्थमें जान । नभके पूर्ण-चंद्रसमान । क्षीरार्णवमें ॥ ४३ ॥ या जैसे दर्पणमें बिंबत होता । उसके सम्मुख जो चित्र रहता । वैसे कृष्ण औ' पार्थ अनुभावता । एक ही बोध ॥ ४४ ॥ फिर भी है वह वस्तु-स्वभाव । बढ़ता जाता प्रिय अनुभव । तभी वह अनुभवका राव । कहता अर्जुन ॥ ४५ ॥ कहनेमें अब व्यापकत्व । कहगया निरुपाधिकत्व । प्रसंगवश स्वस्वरूपत्व । कहनेमें देव ॥ ४६ ॥ कहना वह एक बार । पूर्णरूपसे कृपाकर । श्रीकृष्ण यह सुनकर । कहता भला ॥ ४७ ॥ हमको भी पांडुसुता । इसको कहना भाता । किंतु ऐसा प्रश्न कर्ता । मिलता नहीं ॥ ४८ ॥ आज मनोरथका फल । मिला है तू यहां केवल । खुलकर यह सकल । पूछनेको ॥ ४९ ॥ ज्ञानेश्वरी ६१०
द्वैत-गुरु-शिष्यसंवाद-से अद्वैतके पारका अनुभव— अद्वैतके पारका जो भोगना । वह भोग-सुख अनुभवना । पूछ कर देता है तू अर्जुन । मुझको मेरा ॥ ४५० ॥ सम्मुख होता है जब दर्पण । आप करता अपना दर्शन । वैसे शुद्ध संवादमें अर्जुन । शिरोमणि है तू ॥ ५१ ॥ तेरा अजानसे पूछना । हमको कहते बैठना । ऐसा नहीं इसे जानना । सखा मेरे ॥ ५२ ॥ ऐसा कह दिया आलिंगन । कृपा-दृष्टिसे अवलोकन । फिर किया हरिने कथन । अर्जुनसे क्या ॥ ५३ ॥ जैसे दो होंठोंसे एक बोलना । दो ही चरणसे एक चलना । वैसे दोनोंका पूछना कहना । तेरा मेरा ॥ ५४ ॥ ऐसे हम तुम यहां । देखना एक ही जहां । पूछना कहना यहां । दोनों एक ॥ ५५ ॥ लुब्ध हुये देव मोहसे । अर्जुनके आलिंगनसे । फिर कहते संकोचसे । यह नहीं उचित ॥ ५६ ॥ इक्षुदंड रसकी भेली । नासती लवणसे भली । संवाद-सुख क्रीडा भली । नासेगी जैसे ॥ ५७ ॥ अजी पहलेसे हममें नहीं । नर-नारायणमें द्वैत कहीं । लीन हो अब मेरा मुझमें ही । यह आयेगा ॥ ५८ ॥ इस सोचसे अकस्मात । श्रीकृष्ण कहता है पार्थ । तूने प्रश्न किया उचित । वह कैसा ॥ ५९ ॥ अर्जुन या कृष्णमें लीन । लौट कर आया वह सुन । अपना ही किया हुवा प्रश्न । अब सम्मुख ॥ ४६० ॥ यहां गद्गद हो बोलता । अर्जुन जी ! जी ! कहता । निरुपाधिक जो होता । अपना कह ॥ ६१ ॥ ६११ पुरुषोत्तमयोग
शार्गधर सुन बोला तब । वही कहने लिये अब । कहने लगा जो दोनों भाग । अपनी उपाधिके ॥ ६२ ॥ भगवानकी उपाधिकता— पूछा था निरुपाधिक । कहता है उपाधिक । ऐसा प्रश्न स्वाभाविक । उठेगा यहां ॥ ६३ ॥ अजी ! छासको अलग करना । कहा जाता मक्खन निकालना । हीन कस धातु सब जलना । स्वर्ण-शुद्धि ॥ ६४ ॥ या काईको दूर करना । विशुध्द जलको पा लेना । तथा बादलोंका हटना । आकाश शुध्द ॥ ६५ ॥ ऊपरसे ढका चोकर । फटकके किया तो दूर । शुध्द अनाजका स्वीकार । होता आप ॥ ६६ ॥ वैसे उपाधि उपाहित । विचारनेसे व्यवस्थित । किसीसे न पूछते ज्ञात । होता निरुपाधिक ॥ ६७ ॥ जिस भांति मौन रहकर । बाला प्यारसे सकुचाकर । पति नाम शब्द मारकर । कहती वैसे ॥ ६८ ॥ जो है न कहने जैसा । कहना पडा है ऐसा । तभी उपाधिसे वैसा । कहता श्रीहरी ॥ ६९ ॥ प्रतिपदाकी चंद्ररेखा । दिखाना हो तो वृक्ष-शाखा । दिखाते वैसे उपाधिका । करते वर्णन ॥ ४७० ॥ द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥ पुरुष लोकमें है दो क्षर तथैव अक्षर । क्षर हैं सब ये भूत अक्षर स्थिर है वह ॥ १६ ॥ ज्ञानेश्वरी ६१२
क्षराक्षर पुरुष विचार— श्री कृष्णने फिर बात की । इस संसार नगरकी । बसति है दो पुरुषोंकी । केवल मात्र ॥ ७१ ॥ गगनमें जैसे संपूर्ण । बसते हैं रात औ, दिन । संसार नगरमें मान । वैसे ये दो हैं ॥ ७२ ॥ तीसरा भी एक पुरुष रहता । वह इनका नाम नहीं सहता गांव सह वह इन्हे निगलता । होता जब प्रकट ॥ ७३ ॥ रहने दो तीसरेकी वार्ता । सुनो अब इन दोकी कथा । इस संसार ग्राममें पार्था । बसने आये जो ॥ ७४ ॥ एक है अंधा पगला लूला । दूजा सर्वांग पूर्ण है भला । ग्राम-गुणोंसे संग केवल । हुवा उनका ॥ ७५ ॥ उनमें है एक क्षर । दूसरा जो है अक्षर । दोनोंसे यह संसार । भरा है ठसाठस ॥ ७६ ॥ सुन अब क्षर है कौन । अक्षरका क्या लक्षण । अभिप्राय यह संपूर्ण । कहूंगा तुझको ॥ ७७ ॥ जहां है महदकार । वहांसे हे धनुर्धर । यहां है जो तृणांकुर । वहां तक ॥ ७८ ॥ जो है बड़ा या थोर । चलता या है स्थिर । या जो होता गोचर । मन-बुद्धिसे ॥ ७९ ॥ जो कुछ पंच-भूतसे बनता । नाम-रूपमें आकर फंसता । तथा टकसालसे निकलता । गुणत्रयोंकी ॥ ४८० ॥ शिक्का जो है भूताकृतिका । बनाया जाता जो स्वर्णका । बनता है वह कालका । द्यूत-बीज ॥ ८१ ॥ जानना ही जो विपरीत । तथा जो कुछ होता ज्ञान । वह प्रति-क्षण समाप्त । होता बनके ॥ ८२ ॥ ६१३ पुरुषोत्तमयोग
निकाल कर भ्रांतिका नग । खड़ा किया है सृष्टिका अंग । पहचाना जाता है जो जग । इस नामसे ॥ ८३ ॥ जो अष्टधा भिन्न ऐसे । दिखाया सातमें जैसे । क्षेत्र-द्वारा छत्तीससे । दिखाया है जो ॥ ८४ ॥ पिछला कहना कितना । इसीमें कहा है अर्जुन । वृक्षाकार रूप कारण । प्रस्तुत यहां ॥ ८५ ॥ यह सब है जो साकार । देह-कल्पनासे नगर । बन गया तदनुसार । चैतन्य आप ॥ ८६ ॥ जैसे कूपमें बन आप ही बिंब । सिंह करता प्रतिबिंबसे क्षोभ । फिर उसी क्षेत्रसे है समारंभ । करता कूदनेका ॥ ८७ ॥ या सलिलमें पूर्वका जो होता । व्योम पर व्योम प्रतिबिंबित । वैसे अद्वैत होकर भोगता । द्वैत आप ॥ ८८ ॥ अर्जुन ! जो इस प्रकार । पुर कल्पनासे साकार । करता आत्मा निद्रा घोर । विस्मृतिकी वहां ॥ ८९ ॥ स्वप्नमें शय्या देख जैसे । स्वप्नमें सो जाते हैं वैसे । नगरमें शयन ऐसे । होता आत्माका ॥ ४९० ॥ फिर वह निद्रा मदमें । सुखी या दुखी माननेमें । अहंकारकी समाधिमें । बकता जाता ॥ ९१ ॥ यह जनक या यह माता । यह पुत्र वित्त तथा कांता । मैं काला गोरा हीन या शास्ता । मेरा है यह सब ॥ ९२ ॥ ऐसे स्वप्नाश्व पर हो सवार । दौड़ता जो स्वर्ग और संसार । उस जीवका नाम धनुर्धर । है क्षर पुरुष ॥ ९३ ॥ अब तू सुन यह पार्थ । क्षेत्रज्ञ है जो कहलाता । या जिसको जीव कहता । सारा विश्व ॥ ९४ ॥ अपना रूप जो भूल जाता । सर्व-भूतत्व अनुसरता । वह चैतन्य है कहलाता । क्षर पुरुष ॥ ९५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६१४
वहां है आत्म-रूपसे पूर्णता । इसीलिये है पुरुषता । फिर वह देह-पुरमें सोता । पुरुष-नाम ॥ ९६ ॥ तथा क्षरत्वका जो व्यर्थ । उसपे आक्षेप है पार्थ । यह है उपाधि-ग्रथित । इसीलिये ॥ ९७ ॥ बहते पानीके साथ जैसे । चंद्रबिंब उछळता वैसे । उपाधिके विकारमें ऐसे । दीखता वह ॥ ९८ ॥ या बहता पानी जब सूखता । बिंबित चंद्रमा भी है लोपता । वैसे उपाधि-नाशमें लोपता । उपाधि-धारी ॥ ९९ ॥ ऐसे उपाधिके ही कारण । क्षणिकत्व जुडता है जान । उपाधि नाशके ही कारण । क्षर यह नाम ॥ ५०० ॥ ऐसे जीव चैतन्य संपूर्ण । है यह क्षर-पुरुष जान । अब मैं अक्षरका वर्णन । करूंगा स्पष्ट ॥ १ ॥ अक्षर पुरुषका वर्णन— अक्षर यह दूसरा । पुरुष है धनुर्धर । मध्यस्थ है गिरिवर । मेरु सामान ॥ २ ॥ यह पृथ्वी पाताळ स्वर्गमें । न होता विभाजित तीनोमें । वैसे यह ज्ञान अज्ञानमें । पड़ता नहीं ॥ ३ ॥ यहां न यथार्थ ज्ञानमें एकत्व । या विपरीत ज्ञानमें अनेकत्व । ऐसे केवळ अज्ञान ही जो तत्व । वही यह रूप ॥ ४ ॥ धूलत्व संपूर्ण मिटता । किंतु घटादि नहीं होता । जैसा मृत्तिका पिंड होता । ऐसा मध्यस्थ जो ॥ ५ ॥ सूख जानेपे सागर । नहीं तरंग नहीं नीर । ऐसी यह अनाकार - । दशा जान ॥ ६ ॥ जागृति नहीं जहां अर्जुन । तथा प्रारंभ न होता स्वप्न । इस भांति तम-घन जान । इसका रूप ॥ ७ ॥ ६१५ पुरुषोत्तमयोग
विश्वंका होता है संपूर्ण अस्त । न होता आत्म-बोध प्रकाशित । ऐसी अज्ञान दशा मात्र पार्थ । अक्षर नामकी ॥ ८ ॥
- “अजा” कहनेसे जन्म नहीं । अजन्माको मृत्यु कैसी कहीं । इसीलिये अक्षर सही । अज्ञान घन ॥ ९ ॥ जैसे सर्व कला रहित । चन्द्रमा जो मूल रूपित । दीखे अमावासके रात । वैसे ही यह ॥ ५१० ॥ होते ही सर्वोपाधि विनाश । लीन होती जहां जीव-दशा । फल पाकरके वृक्ष-दशा । बीजमें जैसे ॥ ११ ॥ वैसे उपाधि उपाहित । ये दोनों होते हैं विलुप्त । उसको कहते अव्यक्त । पांडुकुमार ॥ १२ ॥ जिसको है बीज भाव । वेदांतमें दिया नांव । उस पुरुषका ठाव । अक्षरका ॥ १३ ॥ जहांसे है अन्यथा ज्ञान । फैलकर जागृति स्वप्न । नानात्व-बुद्धिमें अर्जुन । घुसे हैं सब ॥ १४ ॥ जहांसे उठता जीवत्व । तथा उठाकर जो शिवत्व । इन दोनोंका जहां लयत्व । वह अक्षर पुरुष ॥ १५ ॥ तथा अक्षर पुरुष जनमें । खेलता है जागृति-स्वप्नमें । या दोनो अवस्थायें उनमें- । से प्रसवती हैं ॥ १६ ॥ जो है आज्ञानघन सुषुप्ति । ऐसी है उसकी प्रख्याति । इसे कहते ब्रह्म-प्राप्ति । यदि न्यून न होता ॥ १७ ॥ वास्तवमें यदि यह पार्था । स्वप्न-जागृतिमें नहीं आता । ब्रह्म-भाव ही कहा जाता । इसको ही ॥ १८ ॥ किंतु प्रकृति पुरुष ये दोनों । मेघ बन आये नभमें मानो । क्षेत्र-क्षत्रज्ञ ये स्वप्नमें दोनों। दीखते निद्रामें ॥ १९ ॥
- अजामेकम् श्रुतिवचन— ज्ञानेश्वरी ६१६
रहने दो यह अधो शाख । संसार रूप जो यह रूख । उसका यह मूल-पुरुष । जो है अक्षर ॥ ५२० ॥ यह पुरुष क्यों कहलाता । अपने पूर्णत्वमें होता । तथा मायापुरीमें है सोता । इससे ही ॥ २१ ॥ और है विश्वका आना जाना । विपरीत ज्ञानका रूप माना । इसने है जिसको नहीं जाना । यह है सुषुप्ति ॥ २२ ॥ तभी यह स्वभावता । क्षरना नहीं जानता । तथा नाश नहीं होता । ज्ञानके बिन ॥ २३ ॥ इसीलिये यह अक्षर । वेदोंमें पांडुकुमार । वेदांत प्रसिद्ध डोंगर । हुवा सिद्धांत ॥ २४ ॥ ऐसे जीव कार्य कारण । जिसे माया संग लक्षण । अक्षर पुरुष है जान । चैतन्य जो ॥ २५ ॥ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७ ॥ तीसरे पुरुषोत्तमका विवेचन— अब जो अन्यथा ज्ञानकी । अवस्थायें हैं दो-जनकी । खो जाती है वह निद्राकी । अज्ञान-स्थितिमें ॥ २६ ॥ वह अज्ञान जब ज्ञानमें डूबता । तथा वह ज्ञान भी कीर्तिमुख होता । जैसे काष्ठ जलाकर स्वयं जलता । वह्नी आप ॥ २७ ॥ ऐसे वह अज्ञान ले गया ज्ञान । पर-तत्व दे गया आप अर्जुन । जाननेके बिना रहा ऐसे ज्ञान । केवल मात्र ॥ २८ ॥ कहाता परमात्मा जो तीजा पुरुष उत्तम । विश्व-पोषक विश्वात्मा है विश्वेश्वरं अव्यय ॥ १७ ॥ (78) ६१७ पुरुषोत्तमयोग
वही है जो उत्तम पुरुष । तीसरा क्यों इसका निष्कर्ष । उन दोनोंसे भिन्न है देख । यह अंतिम ॥ २९ ॥ सुषुप्ति और स्वप्न । उससे भिन्न अर्जुन । जागृति जैसे जान । बोधकी जो ॥ ५३० ॥ किरण अथवा होता मृगजळ । उससे भिन्न जैसे सूर्य-मंडल । वैसे ही भिन्न यह अति बहुल । उत्तम पुरुष ॥ ३१ ॥ जैसे काष्ठमें काष्ठसे भिन्न । भरा रहता अग्नि अर्जुन । वैसे क्षर-अक्षरसे भिन्न । रहता है यह ॥ ३२ ॥ अपनी सीमाओंको निगलकर । नदी नदोंको एक करता नीर । पूर्णत्वमें उठता एक होकर । कल्पांतका उदधि ॥ ३३ ॥ वैसे स्वप्न या नहीं सुषुप्ति । नहीं रहती वहां जागृति । जैसे निगलता दिन-राति । कल्पांतका तेज ॥ ३४ ॥ फिर नहीं एकत्व या द्वैत । है या नहीं जानता है पार्थ । प्रतीति लोप हुई हो दीप्त । रहा नहीं कुछ ॥ ३५ ॥ इस प्रकार जो कुछ है । वही उत्तम-पुरुष है । इसीको सब कहते हैं । परमात्मा ॥ ३६ ॥ वह भी यहां लय नहीं होके । बोलना जीवत्वमें ही रहके । बोलना किनारेमें ही बैठके । डूबे हुएकी बातें ॥ ३७ ॥ वैसे विवेक तट पर । कहते खडा रहकर । पैल तीरकी धनुर्धर । बातें वेद ॥ ३८ ॥ तभी पुरुष क्षराक्षर । दोनों देखके इस और । इसके कहते हैं पर- । आत्म-रूप ॥ ३९ ॥ यहां है इस प्रकार । परमात्म शब्द पर । सुनाते हैं धनुर्धर । पुरुषोत्तम ॥ ५४० ॥ वैसे हे मौनसे ही बोलना । न जाननेसे वहां जानना । तथा न होनेसे ही है होना । वह तत्व ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरी ६१८
सोऽहम् भाव है अस्त होता । कहनेवाला कोई न होता । दृष्टत्व सह जाना है पार्थ । जाना दृश्य भी ॥ ४२ ॥ बिंब तथा है प्रतिबिंबकी । न ले सकते प्रभा बीचकी । कहना नहीं प्रभा कहांकी । ऐसे कभी ॥ ४३ ॥ घ्राण तथा पुष्पके मध्य । सुवास रहता है हृद्य । आंखोंसे दीखना असाध्य । उसे ना कहना ॥ ४४ ॥ वैसे दृश्यादृश्य दोनों मिटता । फिर क्या है यह कौन कहता । इसी अनुभवसे है देखता । वह जो रूप ॥ ४५ ॥ वह है प्रकाश बिन प्रकाश । ईशितव्यके बिना है जो ईश । अपनेसे भरता अवकाश । आप ही सारा ॥ ४६ ॥ नादसे जो सुनना नाद । स्वादसे है चखना स्वाद । अनुभवना जो आनंद । आनंदसे ही ॥ ४७ ॥ सुख ही जहां सुख पाता । तेजसे है तेज मिलता । शून्य भी जहां डूब जाता । महाशून्यमें ॥ ४८ ॥ पूर्णताका जो परिणाम । पुरुष वह सर्वोत्तम । विश्रांतिका भी है विश्राम । जहां लेता विश्रांति ॥ ४९ ॥ विकार पर भी जो रहता । ग्रासको ग्रासकर पूर्णता । बहुतसे जो बहुत होता । बहुत गुना ॥ ५५० ॥ चैतन्य विश्वाकार कैसे दीखता है ?— जो अज्ञानीके प्रति । रजतकी प्रतीति । चांदी न होके शुक्ति । करती जैसे ॥ ५१ ॥ अथवा जो अलंकार रूपमें । न छिपके सोना छिपता उसमें । विश्व न होकर भी वैसे विश्वमें । वह है विश्वाधार ॥ ५२ ॥ अथवा जैसे जल तरंग । पानीसे रहता है अभंग । वैसे प्रतीत करता जग । वह है प्रकाश ॥ ५३ ॥ ६१९ पुरुषोत्तमयोग
अपने संकोच विकास । आप ही कारण वीरेश । जलमें चन्द्र होता जैसा । स्वयं आप ॥ ५४ ॥ वैसे विश्वात्ममें जो कुछ होता । विश्व-लोपसे कहीं नहीं जाता । जैसे रात दिनमें नहीं होता । दो प्रकारका सूर्य ॥ ५५ ॥ वैसे कहीं किसी ओरसे । कम नहीं होता किसीसे । सदैव रहता है वैसे । अपना-सा वह ॥ ५६ ॥ यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥ पुरुषोत्तमका विवेचन— अपनेसे ही जो अर्जुन । प्रकाशता आप है जान । क्या कहूँ उसके समान । नहीं अन्य ॥ ५७ ॥ वह हूँ मैं निरुपाधिक । क्षराक्षरोत्तम हूँ एक । इसीलिये वेद और लोक । कहते पुरुषोत्तम ॥ ५८ ॥ यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ १९ ॥ ऐसा जो मैं पुरुषोत्तम । जानना मुझे प्रियोत्तम । उदय होते ही उत्तम । ज्ञान सूर्य ॥ ५९ ॥ होते ही जागृतिका ज्ञान । मिट जाता है जैसे स्वप्न । स्फुरता उसे त्रिभुवन । सारा व्यर्थ ॥ ५६० ॥ मैं क्षराक्षरसे भी जो भिन्न हूं और उत्तम । इससे वेद लोगोंने कहा है पुरुषोत्तम ॥ १८ ॥ हटाके मोहको दूर जाने मैं पुरुषोत्तम । मुझको भजते हैं वे सर्वज्ञ सर्व-भावसे ॥ १९ ॥ ज्ञानेश्वरी ६२०
अथवा माला हाथमें लेनेसे । सर्पाभास भय मिटता जैसे । मेरे पुरुषोत्तमत्व-बोधसे । जगाभाससे छूटता ॥ ६१ ॥ अलंकार सोनेका है जो जानता । अलंकारके मोहमें नहीं आता । उसी भांति मुझको जो है जानता । छूटता भिन्नत्व ॥ ६२ ॥ फिर सर्वत्र सच्चिदानंद । कहता मैं एक स्वयं सिध्द । अपनेमें अन्य कोई भेद । नहीं जानता ॥ ६३ ॥ उसीसे है सब जाना । अल्प है यह कहना । उसके लिये तू जान । नहीं रहा द्वैत ॥ ६४ ॥ इसलिये मेरा भजन । वही एक योग्य है जान । गगन जैसा अलिंगन । करता गगनका ॥ ६५ ॥ जैसे क्षीर-सागरको भोजन । दे सकता क्षीर-सागर बन । या अमृत होकर ही मिलन । अमृतसे जैसे ॥ ६६ ॥ मिलानेसे सुवर्ण शुध्द । मिलता है सुवर्ण शुध्द । वैसे मैं बनकर सिध्द । मेरी भक्ति ॥ ६७ ॥ अजी ! सिंधु रूप यह नहीं होती । गंगा सिंधुसे कहो कैसे मिलती । इसीलिये मैं न बनकर भक्ति- । में कैसा प्रवेश ॥ ६८ ॥ इसीलिये हे सभी प्रकार । कल्लोल अनन्य है सागर । ऐसे मुझसे हे धनुर्धर । भजता है जो ॥ ६९ ॥ जैसे सूर्य और प्रभा । एक रूप और लोभ । वैसे ही योग्यता लाभ । उस भजनका ॥ ६७० ॥ इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । एतद्बुध्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ २० ॥ ऐसा गूढ कहा शास्त्र निष्पाप तुझसे यह । इसको जानके धीर होते हैं कृत कृत्य ही ॥ २० ॥ ६२१ पुरुषोत्तमयोग
यह शब्द-ब्रह्मका नवनीत है— जबसे किया कहना प्रारंभ । अब तक सब शाखावलंब । कहा है उपनिषद सौरभ । कमलका मान ॥ ७१ ॥ यह शब्द-ब्रह्मका मथित । तथा व्यास प्रज्ञाके है हाथ । मंथन कर जो नवनीत । सार लिया हमने ॥ ७२ ॥ ज्ञानामृतकी है जो जान्हवी । आनंद-चंद्रकी सत्रहवी । विचार क्षीरार्णवकी नवी । लक्ष्मी है यह ॥ ७३ ॥ तभी अपनी पद-वर्णसे । अर्थके यह जीव प्राणसे । मुझे छोड़ न जानती जैसे । महालक्ष्मी जो ॥ ७४ ॥ सम्मुख आया जब क्षराक्षरत्व । न कहा तब उनका पुरुषत्व । तथा समर्पण किया है सर्वस्व । मुझ पुरुषोत्तममें ॥ ७५ ॥ इसीलिये विश्वमें गीता । मुझ आत्मकी पतिव्रता । यह जो अब तू सुनता । इस समय ॥ ७६ ॥ सच बोलना तो यह नहीं शास्त्र । संसार जीतनेका है महाशस्त्र । तथा है आत्म अवतारका मंत्र । इन अक्षरोंमें ॥ ७७ ॥ तुझसे यह है कहा गया । यह ऐसा हुवा धनंजय । यह गोप्य धन निकलवाया । मुझसे आज ॥ ७८ ॥ मुझ चैतन्य शंभुका माथा । जो गीता तत्व था वह पार्थ । उसका गौतम बन आस्था- । निधि तू आया ॥ ७९ ॥ अपनी निर्मलतासे अर्जुन । करते सम्मुख अवलोकन । बन कर तू आया दर्पण । हमारे लिये ॥ ५८० ॥ अथवा भरा हुवा चंद्र तारागण । नभ सिंधुमें होता अवतरण । वैसे ही मैं गीता सह अंतःकरण- । में डूबा तेरे ॥ ८१ ॥ यह गीता आत्म-ज्ञानकी लता है— त्रिविध मल निश्चित । छोड़ गया तुझे पार्थ । तभी तू गीता सहित । बना मम स्थान ॥ ८२ ॥ ज्ञानेश्वरी ६२२
किंतु क्या बोलूं यह गीता । मेरी ज्ञानकी है जो लता । जानता जो इसे समस्त । होता मुक्त मोहसे ॥ ८३ ॥ सेवन की अमृत सरिता । रोग गंवाकर पांडुसुत । अमरपन यह उचित । देती जैसे ॥ ८४ ॥ वैसे ही जाननेसे यह गीता । निर्मोह होना विस्मय क्या पार्थ । अपने आत्म-ज्ञानमें होना रत । होता सरल ॥ ८५ ॥ जिस आत्म-ज्ञानके स्थान । कर्म जो अपना जीवन । लय कर होगा अर्जुन । ऋण-मुक्त ॥ ८६ ॥ खोया हुआ दिखा कर जैसा । मार्ग जाता है वीर-विलास । ज्ञान बनता कलश वैसा । कर्म-प्रासादका ॥ ८७ ॥ इसीलिये ज्ञानी पुरुष । कर्म करता है निःशेष । बोलता अनाथोंका सखा । इस प्रकार ॥ ८८ ॥ इस गीता-ज्ञानकी परंपरा— यह श्रीकृष्ण वचन-अमृत । न समानेसे छलकाता पार्थ । तब हुई हे व्यास कृपा प्राप्त । संजयको यहां ॥ ८९ ॥ उसने धृतराष्ट्रको दिया । धृतराष्ट्रसे पान कराया । इसीलिये जीवांत भया । उसका सरल ॥ ५९० ॥ आया गीता श्रवण अवसर । लगा उसको नहीं अधिकार । किंतु जीवनांत समय पर । उससे मिला प्रकाश ॥ ९१ ॥ द्राक्षा-लतामें दूध डाला जाता । व्यर्थ गया यह ऐसा दीखता । फल पाकमें वह दूना होता । जिस प्रकार ॥ ९२ ॥ वैसे हरिमुखके अक्षर । संजयने कहे स-आदर । उससे अंध स-अवसर । हुवा दुखी ॥ ९३ ॥ उसकी कर देश-भाषा रचना । उसको ऐसी वैसी कर सजना । सुना दिया उसे मैंने जैसे वह जाना । श्रीचरणोंमें ॥ ९४ ॥ ६२३ पुरुषोत्तमयोग
सेवंती जब अरसिक देखते । उसमें विशेष कुछ भी न पाते । किंतु सौरभसे सब कुछ खाते । भ्रमर सार ॥ ९५ ॥ ज्ञानेश्वर महाराजका विनय— वैसे तत्वका करना स्वीकार । खामी देना मुझको लौटाकर । कुछ न जानना स्वभाव सार । अबोध शिशुका ॥ ९६ ॥ यद्यपि यह अनजान होता । उसको देख कर माता पिता । आनंद विभोर होके सतत । होते हैं प्रसन्न ॥ ९७ ॥ वैसे मेरे सर्वस हैं संत । उनसे करना लाड नित । वैसे ही लाड है यह ग्रंथ । मानेंगे आप ॥ ९८ ॥ कव विश्वात्मक यह माझा । स्वामी है निवृत्ति राजा । स्वीकार करें यह वाक्पूजा । कहता ज्ञानदेव ॥ ९९ ॥
गीता श्लोक २०
ज्ञानेश्वरी ओवी ५९९.
१६ दैवासुर-संपद्विभाग-योग चित्सूर्य श्रीगुरु वंदन- मिटाते हुये विश्वका आभास । उदित हुआ विस्मित चंडांश । अद्वय-कमलिनीका विकास । नमन करें अब ॥ १ ॥ अविद्या-तम जो दूर करता । ज्ञानाज्ञान तारोंको निगलता । ज्ञानियोंका है सुदिन करता । स्वबोधका ॥ २ ॥ जिससे उदित होते ही दिन । खुलके आत्म-ज्ञानके नयन । तजता है जीव-पक्षी अर्जुन । देहभावका घोंसला ॥ ३ ॥ लिंग-देह कमल मध्यमें । फंसा चिद्भ्रमर बद्धतामें । बंध-मोक्ष होता है प्रकाशमें । उसके उदयसे ॥ ४ ॥ सिकुडे पथमें शष्प-शब्दोंके । दोनों किनारोंमें भेद-नदीके । चीखते हैं पागल विरहके । बुद्धि औ' बोध ॥ ५ ॥ उन चक्रवाकोंका मिथुन । समरसका जो समाधान । प्रतीत करता चिद्गगन । भुवनका दीप ॥ ६ ॥ जिसके उदयका प्रातःकाल । मिटाता है भेद-चोरका काल । आत्मानुभव-पथिक सकल । चलते योगी ॥ ७ ॥ जिसके विवेक-किरण संग । उन्मेष-सूर्यकांतके स्फुलिंग । जला देता है अरण्य-विभाग । संसारके ॥ ८ ॥ रश्मि-पुंज जिसका अति प्रखर । होते ही स्वरूप ऊसरमें स्थिर । आता वहां महा सिद्धियोंका पूर । मृगजलका ॥ ९ ॥ (79)
अजी प्रबोधके माथे पर । सोऽहंताका मध्यान्ह आकर । आत्म-भ्रांति छाया जो सत्वर । छिपती पदतलमें ॥ १० ॥ तब विश्व-स्वप्न सहित । अन्यथा मति जो निद्रित । न रहती जब माया रात । सम्हालेगा कौन ॥ ११ ॥ तभी अद्वय-बोध-पुरमें अति । महदानंदकी भीडभाड होती । फिर सुखानुभूतिकी उतरती । बात लेनदेनकी ॥ १२ ॥ अथवा माना सदा ऐसा । मुक्त-कैवल्य सुदिवस । देता है सदैव प्रकाश । उदयसे उसके ॥ १३ ॥ निज-धाम-व्योमका राव । उदित रहता सदैव । उदयास्त दिशाका ठाव । मिटाता है वह ॥ १४ ॥ न दीखना दीखने सह मिटाता । दोनोंसे ढका हुवा जो उजलाता । उसका प्रातःकाल ही भिन्न होता । अवर्णनीय ॥ १५ ॥ दिन-रातके जो उस पार । प्रकाश रूप ज्ञान-भास्कर । दीप्ति बिन दीप्ति है अपार । देखता कौन ॥ १६ ॥ मौन छोडकर गुरु-गुण-वर्णनके लिये क्षमा याचना— श्रीनिवृत्ति वह चित्सूर्य । नमन उसे स-विनय । बाधक है स्तवन-कार्य । शाब्दिक जो यहां ॥ १७ ॥ गुरु-देवकी महिमा देखकर । स्तवन करना हो यदि सुंदर । गुरु-चरणमें लीन हो तत्पर । स्तव्य-बुद्धिसे ॥ १८ ॥ न जानते जो सब जानते । मौन निगल बखाने जाते । कुछ भी न होनेसे हैं आते । अपने यहां जो ॥ १९ ॥ तेरी स्तुतिमें होना जिसे तत्पर । पश्यंति मध्यमाको निगलकर । होती है परा सह वैखरी फिर । जहां विलय ॥ २० ॥ एसे तुझमें सेवकपनमें । शब्द-स्तोत्र-भूषण चढानेमें । यह सहनकर कहनेमें- । भी न्यून अद्वयानंद ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी ६२६