भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वैसे ही इंद्रियां उसके साथ । करती अपना व्यापार पार्थ । उसको कहते लोग यथार्थ । मोगना ऐसे ॥ ७४ ॥ भोग-क्षीणसे पीछे स्वाभाविक । शरीर गिरता है यह देख । वह गयारे गया ऐसे चीख-। कहते हैं बंसे ॥ ७५ ॥ जैसे देखके वृक्ष हिलता । कहते हैं पवन बहता । किंतु जहां वृक्ष नहीं होता । नहीं क्या पवन ॥ ७६ ॥ या रखकर सम्मुख दर्पण । उसमें कर अपना दर्शन । भासता आप हुवा है उत्पन्न । उससे पूर्व नहीं क्या ॥ ७७ ॥ या परे हटाके दर्पण । अपना लोप हुवा मान । आप नहीं ऐसे अर्जुन । ऐसा मानना क्या ॥ ७८ ॥ शब्द है जैसे आकाशका । किंतु माना जाता मेघका । या चंद्रके वेग अभ्रका । करता आरोप ॥ ७९ ॥ वैसे शरीरका आवगमन । निर्विकार आत्मापे आरोपण । करते हैं वे भ्रमसे अर्जुन । निश्चय-पूर्वक ॥ ३८० ॥ आत्मामें यहां आत्म-धर्म । तथा देहमें देह-धर्म । जानते जो इसका मर्म । वे हैं दूसरे ही ॥ ८१ ॥ ज्ञानसे हैं जिसके नयन । देखते हैं आत्म भेदके तन । मेघ-भेदमैं सूर्य-कीरण । ग्रीष्ममें जैसे ॥ ८२ ॥ वैसे ही कर विवेक विस्तार । ज्ञानियोंकी बुद्धि होती है स्थिर । देखते आत्माको वैसे ही धीर । इस भांतिसे ॥ ८३ ॥ जैसे तारागणसे भरा गगन । जलमें पडा है दीखता अर्जुन । किंतु नहीं पडा टूटके गगन । यह जानते वैसे ॥ ८४ ॥ गगनके स्थानपे है गगन । यह केवळ है आभास जान । वैसे हैं आत्म-शरीर भिन्न । मानते हैं वे ॥ ८५ ॥ कलकल बहते पानीमें चंचल । दिखती है चांदनीकी जो हलचल । चांदनी होती चंद्रके साथ निश्चल । जानके देखते हैं ॥ ८६ ॥ ज्ञानेश्वरी ६०४