ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिंतु जो जीवका बोध देता । हलनल प्रकट करता । तभी वह शब्द अर्थ देता । लोकमें जीव ॥ ४६ ॥ जन्मना तथा मरना । इसको सच मानना । मेरा संसार कहना । यह जीवलोक ॥ ४७ ॥ ऐसे जीवलोकमें अर्जुन । करता मेरा अवलोकन । जैसे चन्द्रमा नीरमें जान । जो उदकातीत ॥ ४८ ॥ जैसे कभी कोई स्फटिक । केशर पर पड देख । प्रकट होता लाल देख । किंतु न होता लाल ॥ ४९ ॥ वैसे अनादिपन नहीं टूटता । अकर्तापन मेरा नहीं भंगता । किंतु कर्ता भोक्ता ऐसा भासता । यह भ्रम है जान ॥ ३५० ॥ या आत्मा है जो निर्विकार । प्रकृतिसे हो एकाकार । प्रकृतिके धर्मानुसार । देखता अपनेमें ॥ ५१ ॥ मन सह सभी इंद्रिय । करते प्रकृतिका कार्य । उन्हें अपना धनंजय । होना प्रवृत्त ॥ ५२ ॥ स्वप्नमें जैसे कोई परिव्राजक । आप अपना कुटुंब होके देख । भागदौड़ करता मोह मूलक । जैसे वैसे भी ॥ ५३ ॥ वैसे है अपनी ही विस्मृति । आत्मा आप ही होता प्रकृति । उसीको मान सुभद्रापति । भजता उसीको ॥ ५४ ॥ मन रथ पर चढ़कर । श्रवण द्वारसे हो बाहर । शब्द-काननमें भयंकर । घुसता है वह ॥ ५५ ॥ वैसे ही प्रकृतिकी रास । त्वचाके हाथमें दे खास । स्पर्श-द्वारसे है प्रवास । करता वनमें ॥ ५६ ॥ अजी ! कभी किसी अवसर । नेत्र-द्वारसे पड़ बाहर । चढ़ता है रूपका डोंगर । स्वैर-भावसे ॥ ५७ ॥ वैसे ही रसनाका पथ । चलकरके वह पार्थ । रस भरने उदरार्थ । लगता वह ॥ ५८ ॥ ६०१ पुरुषोत्तमयोग (76)