ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसारा ही आकाश निगलकर । व्याप्त होता ब्रह्मांड भास्कर । तब कहां प्रति-बिंब और । कहां रश्मि-जाल ॥ ३६ ॥ अथवा कल्पांतमें भरा नीर । उसमें कैसे ओघ धनुर्धर । कैसे होंगे मुझमें अविकार । अंशादि तब ॥ ३७ ॥ किंतु जैसे ओघके कारण । ऋजु नीर दीखे वक्र बन । रविको भिन्न पन अर्जुन । आता नीरमें ॥ ३८ ॥ गगन वर्तुल या चौकोर । कैसे मिलेगा पांडुकुमार । घट मठसे घिर आकार । दीखेगा वैसे ॥ ३९ ॥ अजी ! निद्राका ले आधार । स्वप्नमें राजा बनकर । अकेलेसे ही जग भर । होता राज्य ॥ ४० ॥ या मिलनेसे कस हीन । शुध्द स्वर्ण जैसे अर्जुन । कसमें उतरता निम्न । वैसे मैं स्वमायामें ॥ ४१ ॥ उससे फैलता है अज्ञान । कोऽहं भावका उठता प्रश्न । विचारके कहता मन । मैं देह हूं ऐसे ॥ ४२ ॥ ममैकांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७ ॥ शरीर है जितना आत्मज्ञान भी है अपना— ऐसे शरीर है जितना । आत्म-ज्ञान भी आपना । जिससे है अनुभवना । मेरा अल्पांश ॥ ४३ ॥ वायु संयोगसे है सागर । उमडता ले तरंगाकार । वह समुद्रांश धनुर्धर । दीखता अल्प ॥ ४४ ॥ वैसे जडको चेतना देता । देहाहंता प्रकट करता । मैं जीव हूं ऐसा भास होता । जीव लोकका ॥ ४५ ॥ जगमें अंश मेरा ही हुआ जीव सनातन । खींचता है प्रकृतीसे मन औ' पांच इंद्रियां ॥ ७ ॥ ज्ञानेश्वरी ६००