भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 674, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 674

अथवा पथ कर घ्राण । देहेश करता गमन । फिर जो गंधके दारुण । अरण्य लांघता ॥ ५९ ॥ ऐसे वह इंद्रिय नायक । करके मनको सहायक । शोधते जाता है शब्दादिक । विषय सारे ॥ ३६० ॥ शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ ८ ॥ जाते समय जीव इंद्रियोंके साथ जाता है— किंतु ऐसे कर्ता भोक्ता । जिवन-रूप दीखता । जैसे तनमें करता । यह प्रवेश ॥ ६१ ॥ अजी! कोई विलासी तथा धनिक । जाना जाता है उसी समय देख । बसता है जब वह हो स्थाइक । राजधानीमें ॥ ६२ ॥ वैसे बढ़ता कर्तृत्व अहंकार । विषयेंद्रिय-तांडव धनुर्धर । जाना जाता है तभी पाता शरीर । जब यह जीव ॥ ६३ ॥ अथवा छोड़ता है शरीर । तब इंद्रियां निकाल कर । अपने ही साथ धनुर्धर । ले जाता है ॥ ६४ ॥ जैसे अपमानित अथिति । ले जाता है सुकृत-संपत्ति । या ले जाता है गुड्डेकी गति । सूत्र-तंतू ॥ ६५ ॥ अथवा प्रकाश अस्तमान । ले जाता है सबका दर्शन । अथवा है सुगंध पवन । ले जाता जैसे ॥ ६६ ॥ वैसे मन सह इंद्रियां । देह-राज है धनंजय । शरीर तजते समय । ले जाता है ॥ ६७ ॥ जैसे पुष्पादिसे वायु ले जाता गंध खींचके । वैसे लेकर ये ईश छोड़ता धरता तन ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ६०२