ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिकलते ही मंदराचल । हुवा क्षीर-सागर निश्चल । उसमें कामोर्मियोंका उबाल । नहीं होता ॥ २ ॥ षोडश कलायुत चंद्र-पूर्ण । न दीखे किसी ओरसे अपूर्ण । वैसे अपेक्षाका न्यून उत्पन्न । न होता उसमें ॥ ३ ॥ निरूपका कैसे करूं वर्णन । आंधीमें नहीं टिकता रजकण । वैसे नहीं आते विषय अर्जुन । उसके सम्मुख ॥ ४ ॥ एवं जिन्होंने किये ऐसे । यज्ञ ज्ञानाख्य हुताशसे । यहां वे मिलते हैं वैसे । मानो स्वर्णमें स्वर्ण ॥ ५ ॥ मेरा वह परम पद— वहां कहा तो कहां । पूछेगा यदि यहां । न पहुंचता जहां । नाशका नाम ॥ ६ ॥ दृश्यत्वसे जो देखा जाता । या ज्ञेयत्वसे जाना जाता । अमुक ऐसे कहा जाता । ऐसा नहीं जो ॥ ७ ॥ न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ६ ॥ किंतु जो दीपके प्रकाशसे । या चन्द्राग्निके प्रकाशनेसे । अधिक क्या कहूं मैं इससे । न प्रकाशता सूर्यसे भी ॥ ८ ॥ ऐसे प्रकाशसे जो दीखता । उससे वह नहीं दीखता । जिससे विश्व दर्शित होता । उससे वह लोप ॥ ९ ॥ खोता जब शुक्तिापन । भासता रजतपन । या लोपसे सर्पपन । दीखता डोरा ॥ ३१० ॥ श्रेष्ठ जो चंद्र-सूर्यादिक । बडे हैं प्रकाश दायक । उसके अंधारमें देख । प्रकाशते हैं ॥ ११ ॥ प्रकाशता नहीं सूर्य उसको अग्नि चंद्र भी । न लौटता वहां जाके मेरा उत्तम धाम जो ॥ ६ ॥ ५९७ पुरुषोत्तमयोग