भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 668, कुल 1172 में से

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जैसे सकल दोष ऋण । अंकुरती पृथ्वी अर्जुन । उस भेद बुद्धिका भान । नहीं होता उसे ॥ ८९ ॥ जब सूर्यका उदय होता । रातका अस्तित्व न रहता। वैसे देहाहंकार भागता । अविद्या सह ॥ २९० ॥ जैसे जीवको आयुष्य हीन । छोडता शरीर उसी क्षण । वैसे तजता द्वैत अर्जुन । उस पुरुषको ॥ ९१ ॥ पारसको लोहेका अकाल होता । रविसे कभी अंधार न मिलता । द्वैत-बुद्धिका दर्शन नहीं होता । उसको कभी ॥ ९२ ॥ अजी ! सुख दुःखका आकार । द्वंद्व होते देहमें गोचर । उसके सन्मुख धनुर्धर । नहीं होते कभी ॥ ९३ ॥ स्वप्नका राज्य या मरण । हर्ष या शोकका कारण । न होता जागृतिमें जान । उसी भांति ॥ ९४ ॥ वैसे सुख दुःख रूप । द्वंद्व जो पुण्य औ' पाप । न घेरते उसे साप । गरुड़को जैसे ॥ ९५ ॥ तथा अनात्म-वर्ग नीर । छोड़ आत्म-रसका क्षीर । करता है जो स-विचार । राज हंस-सा ॥ ९६ ॥ वर्षा कर जैसे पृथ्वीपर । अपने ही रसको भास्कर । खींचता रश्मियां फैलाकर । अपने ही बिंबमें ॥ ९७ ॥ आत्म-भ्रांतिके लिये ही वैसे । बिखुरे वस्तु सभी ओरसे । एकत्र किये ज्ञान दृष्टिसे । अखंड जो ॥ ९८ ॥ तथा निर्णयमें आत्माका । विवेक डूबता उनका । प्रवाह डूबता गंगाका । सिंधुमें जैसे ॥ ९९ ॥ या होनेसे आप संपूर्ण । न रहा आशाका कारण । न करता इच्छा गगन । परे जानेकी ॥ ३०० ॥ जैसे हैं अग्निका डोंगर । न लेता बीज अंकुर । उसके मनमें विकार । न आते वैसे ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ५९६

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