ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअहांसे इतना धनुर्धर । होता विश्व-क्रमका विस्तार । व्यर्थ अभिष्ठ जिस प्रकार । होता निर्दैवीका ॥ ८१ ॥ कैसे वह रूप देखना । अपनेमें आप अपना । हिमसे है हिम जमना । हिम-रूपमें ॥ ८२ ॥ और एक जो उसका । लक्षण है जाननेका । उससे पुनर्जन्मका । होता है अंत ॥ ८३ ॥ किंतु उससे मिलते जैसे । भरकर सर्वत्र ज्ञानसे । महा-प्रलयमें नीर जैसे । भरा रहता है ॥ ८४ ॥ निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै- र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ५ ॥ वही प्राज्ञ इस परमात्म-पदको प्राप्त करते हैं— जिस पुरुषका मन । छोड़ गये मोह मान । वर्षांतमें जैसे घन । आकाशको ॥ ८५ ॥ जो है अकिंचन निष्ठुर । उससे ऊबता है घर । वैसे ही उसको विकार । तज जाते हैं ॥ ८६ ॥ उखडता फला हुवा केल । वैसे आत्म-लाभसे प्रबल । क्रिया कलाप होते उन्मूल । अपने आप ॥ ८७ ॥ वृक्ष है जब जलता । पक्षी-गण उड़ जाता । वैसे उसको तजता । विकल्प सारा ॥ ८८ ॥ जो मान मोहासह संग-दोष उखाड निष्काम अध्यात्म निष्ठ । निर्द्वन्द्व जो हो सुख दुःख मुक्त वे प्राज्ञ पाते वह नित्य धाम ॥ ५ ॥ ५९५ पुरुषोत्तमयोग