ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिंतु दर्पणका ले आधार । तथा एकका दूसरा कर । रूप देखते हैं जो गंवार । वैसा नहीं यह ॥ ६८ ॥ यह ऐसे देखना है अर्जुन । कूंआ खोदनेसे पूर्व झरना । रहता है आप भरा हो पूर्ण । अपनेमें जैसे ॥ ६९ ॥ अथवा सूखने पर अंभ । निज-बिंबमें ही प्रतिबिंब । अथवा मिल जाता है नभ । घटाभावमें ॥ २७० ॥ अग्निका इंधनांश समाप्त होत । अग्नि जैसेमूल रूपमें लौटता । वैसे ही अपनेको देखना होता । आप ही स्वयं ॥ ७१ ॥ जिह्वाको अपना ही रस चखना । दृष्टिको अपना ही रूप देखना । वैसे उसका निरीक्षण करना । अपनेको ही ॥ ७२ ॥ या प्रकाशसे प्रकाशका मिलना । गगनमें गगनका है चढ़ना । अथवा पानीसे पानीकी भरना । अपनी गोद ॥ ७३ ॥ अपनेको आप लक्षित । करता है जब अद्वैत । वह ऐसे होता है पार्थ । कहता हूं मैं ॥ ७४ ॥ न देखते ही जो देखना । कुछ न जानते ही जानना । महापद जो है अर्जुन । आदि पुरुषका ॥ ७५ ॥ वहां भी उपाधिका ले आधार । होती वर्णनमें श्रुति तैयार । नाम रूपका गडबड फिर । करती है व्यर्थकी ॥ ७६ ॥ संसार स्वर्गसे जो उकता कर । मुमुक्षुके ज्ञान योगका आधार । जहां जाने निकले पांडुकुमार । प्रतिज्ञा-पूर्वक ॥ ७७ ॥ करते हैं संसारके आगे दौड़ । वे वीत-राग पुरुष कर होड । पीछे डालते ब्रह्म-लोकको गाड । अतिक्रमण कर ॥ ७८ ॥ अहंकार आदि जो भाव । तज कर अपना सर्व । आज्ञा-पत्र लेते पांडव । मूल गृहका ॥ ७९ ॥ आत्म विषयमें जो अज्ञान । लाया बड़ा संसारका ज्ञान । न था जो उसने दिया स्थान । मैं तू पनको ॥ २८० ॥ ज्ञानेश्वरी ५९४