भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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फिर निश्चयका मुष्टि-बल । देखना एक दो बार तौल । तब उसे धरना निश्चल । मनन तक ॥ २६० ॥ अपनेसे जब हथियार । निज-ध्याससे एक होकर । न रहेगा दौडने दूसरा । अपनेसे आगे ॥ ६१ ॥ आत्म-ज्ञानकी जो तलवार । अद्वयानुभव फैलाकर । न रहेगा भव-तरुवर । कहीं भी कभी ॥ ६२ ॥ शरदागमनका समीर । करता जैसे स्वच्छ अंबर । या उदित हो रवि अंधार । निगलता जैसे ॥ ६३ ॥ अथवा होते ही जागृत । होता जैसे स्वप्नका अंत । स्वबोध धारसे अश्वत्थ । कहीं रहता नहीं ॥ ६४ ॥ तब ऊर्ध्व या अधका मूल । नीचेका भी तब शाखा-जाल । न दीखता जैसे मृगजल । चांदनीमें वैसे ॥ ६५ ॥ इस प्रकार तू धनुधर । आत्म-ज्ञानकी ले तलवार । तोडकर यह तरुवर । ऊर्ध्वमूलका ॥ ६६ ॥ ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः । तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४ ॥ फिर अपनेमें अपना रूप आप देखना- फिर "इदं"का संबंध नहीं होता । "अहंत्व"के बिन जो प्रसिद्ध होता । यह अपना ही रूप है देखता । आप ही आप ॥ ६७ ॥ ढूंढे वही जो पद है महान पीछे जहांसे मुडना न होता । विलीन होना उस रूपमें ही प्रवृत्ति निकली जहां अनादि ॥ ४ ॥ ५९३ पुरुषोत्तमयोग (75)

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