ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआत्म-ज्ञानका ले करवाळ— अपना ही अज्ञानका बल । लेके हुवा यह दृढ-मूल । आत्म-ज्ञानका ले करवाळ । तोडना इसे ॥ ४८ ॥ ज्ञान छोड करके एक । करनेसे उपाय देख । उलझेगा तू अधिक । इसी वृक्षमें ॥ ४९ ॥ फिर कितने शाखसे शाखको । उछलेगा अध और ऊर्ध्वको । तभी काट तू अज्ञान मूलको । सम्यक्-ज्ञानसे ॥ २५० ॥ वैसे ही डोरका विषधर । मारने किया लठियोंका ढेर । उससे होगा केवल भार । व्यर्थका जो ॥ ५१ ॥ तैरने गंगा मृग-जलकी । दौड-धूप की नांव लानेकी । औ' लगाई नालेमें डुबकी । जो था यथार्थ ॥ ५२ ॥ अस्तित्व हीन जो संसार । नाशने किये श्रम घोर । तथा उसीमें धनुर्धर । गया आप ॥ ५३ ॥ जैसे नाशने स्वप्नका भय । जगना उपाय धनंजय । अज्ञान मूलका है उपाय । ज्ञान खड्ग ॥ ५४ ॥ लीलासे यदि उसको चलाना । तब वैराग्यका नित्य-नूतन । करना अभंग बल-साधना । बुद्धिको पार्थ ॥ ५५ ॥ होता वैराग्यका उत्थान । तब त्रिवर्ग है जान । मानो श्वानका वमन । लगता वह ॥ ५६ ॥ यहां तक है अर्जुन । वस्तु-जातमें संपूर्ण । अरुचि उभार मान । वैराग्यका हो ॥ ५७ ॥ फिर देहाहंताका म्यान । उतार करके तत्क्षण । प्रत्यग्बुद्धि करमें जान । धरना वह ॥ ५८ ॥ फिर वह विवेक सानपे धरना । 'ब्रह्म हूं' यह बोध तीव्र करना । फिर उसी एक बोधसे है घिसना । पूर्ण रूपसे ॥ ५९ ॥ ज्ञानेश्वरी ५९२