ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसा भव-द्रुमका मूल । ऊपर पाकरके बल । उसके हैं दलके दल । उतरते नीचे ॥ ९३॥ संसार-वृक्षका पहला पल्लव— वहां चिद्वृत्तिके पहला । महतत्व कोंपल खिला । पल्लव जो हरा निकला । कोंपल एक ॥ ९४ ॥ फिर सत्व-रज-तमात्मक । त्रिविध अहंकार जो एक । वह तिगुना हो अधोमुख । फूटी डाल ॥ ९५ ॥ बुद्धिका लेकर अंकुर । बढ़ाता भेदको अपार । तन मनकी डाल सुंदर । बढ़ने लगती ॥ ९६ ॥ ऐसे ले कर मूलकी दृढता । विकल्प रसकी जो कोमलता । चित्त-चतुष्टयकी विविधता । फूटते पल्लव ॥ ९७ ॥ भवद्रुमका विस्तार— आकाश वायु द्योतक । और है पृथ्वी उदक । फूटती ये पांच शाख । उसमें जोरसे ॥ ९८ ॥ वैसे ही श्रोत्रादि तन्मात्रा । उसके अंगभूत पत्र । जो हैं अति चित्र विचित्र । फूटते रहते ॥ ९९ ॥ तब शब्दांकुर पर्यंत । होते हैं श्रोत्र विकसित । आकांक्षाके नूतन पार्थ । चढती डालियां ॥ १०० ॥ अंग-त्वचाका जो लता पल्लव । स्पर्शांकुर तक होते फैलाव । वहां बढते हैं नित नव । विकार विविध ॥ १ ॥ तब रूप-पत्रके दलके दल । दूर तक फैलाती हैं आंखें सरल । फैलता है तब बड़ा भ्रम-जाल । सविस्तृत ॥ २ ॥ और रसनाका शाखा खंड । वेगसे बढता है उदंड । जिव्हा चापल्यके जो प्रचंड । फूटते शाख ॥ ३ ॥ वैसे ही गंधकी जो कोंपल । घ्राणेंद्रियको करती प्रबल । तब गंध-लोभ फैलाता विपुल । आनंद पल्लव ॥ ४ ॥ ५७९ पुरुषोत्तमयोग