ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसी जो महदहं-बुद्धि । मन महाभूत संसृष्टि । इस संसारकी अवधि । बना लेते हैं ॥ ५ ॥ भव-द्रुमका स्वरूप — अजी ! यह इन्ही आठ अंगसे । फैलता जाता है अति वेगसे । किंतु है रजत-रूपसे जैसे । दीखती सीप ॥ ६ ॥ या सागरका जितना विस्तार । उतना ही तरंगत्व संचार । वैसे है ब्रह्म ही वृक्ष-आकार । अज्ञान मूल ॥ ७ ॥ यही अब इसका विस्तार । और इसका है यही प्रसार । स्वप्नमें अपना परिवार । होता जैसे एकका ही ॥ ८ ॥ रहने दो अब यह वर्णन । इस भांति यह बढ़ता जान । महदादि बोझसे है अर्जुन । अधोशाख ॥ ९ ॥ इसको अश्वत्थ क्यों कहते हैं— इसको अश्वत्थ ऐसे । कहते हैं जो क्यों कैसे । वह भी सुन तू इसे । कहता हूं मैं ॥ ११० ॥ अजी ! श्वः कहा तो कल । तब तक प्रति पल । रहना नहीं निश्चल । इसका कभी ॥ ११ ॥ जैसे है बीतता है क्षण । मेघ बदलता नाना वर्ण । या बिजली न होती संपूर्ण । निमिष एक ॥ १२ ॥ या कांपता हुआ पद्म-दलं । उस पर पड़ा हुआ जल । या चित्त जैसे होता व्याकुल । मनुष्यका ॥ १३ ॥ वैसे ही है इसकी स्थिति । नासता जाता क्षण प्रति । इसीलिये हे शुद्ध-मति । कहते अश्वत्थ ॥ १४ ॥ तथा अश्वत्थ ऐसी संज्ञा । पीपलको पड़ी सुविज्ञा । नहीं वह भाव सर्वज्ञ - । श्रीहरिका यहां ॥ १५ ॥ वैसे पीपल कहा तो एक । मैंने मान लिया होता देख । किंतु रहने दे जो लौकिक । इसमें क्या अर्थ ॥ १६ ॥ ज्ञानेश्वरी ५८०