ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसीलिये यहां प्रस्तुत । यह है अलौकिक ग्रंथ । यहां क्षणिकत्वको अश्वत्थ । कहा गया है ॥ १७ ॥ यह और ही है एक विध । अव्ययत्वमें अति प्रसिद्ध । इसका प्रकार अंतर्सिद्ध । है इस भांति ॥ १८ ॥ जैसे मेघ-मुख एक ओर । सुखाते रहते हैं सागर । तथा नदियां दूसरी ओर । भरती रहतीं ॥ १९ ॥ जिससे न चढता न उतरता । सदा एकसा भरा पूरा रहता । किंतु जब तक सम योग होता । मेघ-नदियोंका ॥ १२० ॥ वैसे इस वृक्षका होता जान । उस गतिका तर्क नहीं होना । तभी लोगोंका अव्यय कहना । इसको यथार्थ ॥ २१ ॥ जैसे दान-शील मनुष्य । करता दानसे संचय । वैसे व्ययसे है अव्यय । यह वृक्ष ॥ २२ ॥ अथवा रथका चक्र जैसे । चलता अतिशय वेगसे । दीखता भूमिमें धंसा ऐसे । उसी प्रकार ॥ २३ ॥ वैसे ही तीव्र गतिसे कालकी । गिरती भूत शाखामें जिसकी । वहां फूटती असंख्य इसकी । कोंपल नित्य ॥ २४ ॥ ऐसे गलते जाते कितने । नये फूटते जाते कितने । न जाने आते जाते कितने । सावनके बादलसे ॥ २५ ॥ कल्पांतमें होते नष्ट भ्रष्ट । कल्पारंभमें होते हैं जो सृष्ट । और होते हैं अनेक विश्व-दृष्ट । धनंजय ॥ २६ ॥ प्रचंड संहार-वातसे प्रलयके । झड़ते छिलके जब इस वृक्षके । फूटते नव-अंकुर कर्मांरंभके । करोडोंमें ॥ २७ ॥ मन्वंतर सरकता मनुके नंतर । बढ़ते जाते अनेक वंश वंश पर । मानो बढता है ईख कांड कांड कर । वैसे ही यह वृक्ष ॥ २८ ॥ कलियुगांतमें सूखा छिलका । चार युगोंका झड़ता इसका । तब बढ़ता है कृत-युगका । नूतन मोटा ॥ २९ ॥ ५८१ पुरुषोत्तमयोग