ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे वर्ष पर वर्ष बीतता । एक दूसरेका मूल बनता । वैसे दिवस आता और जाता । जानते नहीं ॥ १३० ॥ जैसे वायुकी लहर आना । उसका जोड़ नहीं समझना । वैसे डालोंका झड़ना बढ़ना । समझता नहीं ॥ ३१ ॥ गिरता जब एक देहांकुर । फूटते सहस्र शरीरांकुर । तब दीखता भव तरुवर । अव्यय ऐसा ॥ ३२ ॥ पानी बहता जब तीव्र गतिसे । वैसे ही आता है अधिक पीछेसे । तभी उस स्रोतको अनंत ऐसे । मानते लोग ॥ ३३ ॥ या जितनेमें पलक झपकती । करोड़ों लहरें उठ गिरती । जिससे है दृष्टि अनुभवती । तरंग है नित्य ॥ ३४ ॥ या एक ही दृष्टि काग दोनों ओर । फिराता चातुर्यसे स अवसर । जिससे होता है भ्रम धनुर्धर । कागकी हैं दो आंखें ॥ ३५ ॥ लट्टू घूमता है तीव्र गतिसे । लगता है चिपक बैठा भूमिसे । इसका वेगातिशय होता वैसे । भ्रमका कारण ॥ ३६ ॥ अंधारमें अति वेगसे । अग्नि-काष्ठको घुमानेसे । सहज ही दीखता जैसे । चक्राकार ॥ ३७ ॥ यह संसार-वृक्ष ऐसा । नासता बढता सहसा । न देख लोक पागल-सा । मानता अव्यय ॥ ३८ ॥ किंतु जो इसका वेग देखता । इसके क्षणिकत्वको देखता । करोड़ों बार यह होता जाता । क्षण भरमें जो ॥ ३९ ॥ अज्ञानके बिन नहीं मूल । इसका अस्तित्व नकल । यह वृक्ष अति क्षीण-छाल । देखा जिसने ॥ १४० ॥ उसे मानता मैं सर्वज्ञ । वह है वंदनीय प्राज्ञ । ब्रह्म-सिद्धांतका है सूज्ञ । धनुर्धर ॥ ४१ ॥ योग-मात्र जो सकल । मिला है उसको ही फल । उसके बलसे केवल । जीता ज्ञान ॥ ४२ ॥ ज्ञानेश्वरी ५८२