भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 650, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 650

अजी ! माया ऐसी ख्याति । चलती है जो है नास्ति । जैसे वंध्याकी संतति । बातोंमें ही ॥ ८० ॥ वह होती अथवा नहीं होती । विचारका नाम नहीं सहती । यहां वह अनादि कहलाती । इस प्रकारकी ॥ ८१ ॥ यह है भव-द्रुम बीजिका । या प्रपंचकी भूमिका । औ, विपरीतज्ञान-दीपिका । प्रज्वलित है जो ॥ ८२ ॥ अनेक शक्तियोंकी पेटिका । आकाश मानो विश्वदभ्रका । वस्त्र है जो आकार मात्रका । तह किया हुवा ॥ ८३ ॥ माया साथ ही है ब्रह्मके । होकर भी जैसे नहींके । प्रकट होती है वस्तुके । प्रकाश रूप जो ॥ ८४ ॥ अपनेको आती है जब नींद । करती तब अपनेको मुग्ध । कजली करती प्रकाश मंद । दीपकका जैसे ॥ ८५ ॥ प्रियके साथ तरुणांगी स्वप्नमें । सोई हुई उठकर शीघ्रातमें । आलिंगनके बिना आलिंगनमें । करती सकाम ॥ ८६ ॥ ऐसे स्वरूपमें हुई जो माया । स्वाश्रयमें अज्ञान धनंजय । वही इस भव-तरुका भया । पहला मूल ॥ ८७ ॥ वस्तुका अपना जो अबोध । ऊपर वह बांधता कंद । वेदांतमें भी यही प्रसिद्ध । कहा बीज-भाव ॥ ८८ ॥ घना अज्ञान भाव जो सुषुप्ति । बीजांकुर-भाव सुभद्रापति । अन्य दो जो स्वप्न और जागृति । उसका फल भाव ॥ ८९ ॥ ऐसा वेदांत प्रतिपादन । संज्ञा है ये प्रसिद्ध तू जान । रहने दो यहां है अर्जुन । अज्ञान मूल ॥ ९० ॥ उस अतीत आत्माको निर्मळ । अधोर्ध्व सूचित करके मूल । तथा चारों ओर बना वर्तुळ । माया-योगका ॥ ९१ ॥ फिर हो अनेक देहांतर । छूटते हैं उसके अपार । सभी ओरसे बना अंकुर । गहरे उतरते ॥ ९२ ॥ ज्ञानेश्वरी ५७८

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 650, कुल 1172 में से · BharatKosha