ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभगवान उवाच ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥ ऊर्ध्व-मूल ब्रह्मका वर्णन— फिर कहता है पांडव । इस तरुका है जो ऊर्ध्व । वृक्षके कारण सदैव । दीखता सहज ॥ ७२ ॥ वैसे मध्य ऊर्ध्व अध । ऐसा नहीं जहां भेद । कहते हो एकवद् । उस अद्वयका ॥ ७३ ॥ वह है अश्रवणीय नाद । तथा असौरभ्य मकरंद । तथा जो निरालंब आनंद । बिना रतिका ॥ ७४ ॥ जिसको जो आर-पार । तथा आगे-पीछेकी ओर । दृश्यादृश्यसे अगोचर । देखना है ॥ ७५ ॥ उपाधिका जो दूसरा । फैलानेसे है पसारा । नाम-रूपका संसार । होता जहां ॥ ७६ ॥ ज्ञाता ज्ञेयसे विहीन । केवल मात्र जो ज्ञान । सुखसे भरे गगन- । से चूता है ॥ ७७ ॥ नहीं है जो कार्य अथवा कारण । या अन्यसे आया जो अकेलापन । जिसको अपनेमें ही आप जान । भली भांति ॥ ७८ ॥ संसार-वृक्षका बीज और जड़— ऐसी सत्य-वस्तु जिसकी । जड़ है ऊपर इसकी । वहांसे निकली इसकी । कोंपल ऐसे ॥ ७९ ॥ श्री भगवानने कहा ऊंचे मूल तले शाख नित्य अश्वत्थ है कहा । उसके दलमें वेद पढे जो वेद जानता ॥ १ ॥ (73) ५७७ पुरुषोत्तमयोग