ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे ही ऊर्ध्वकी ओर । शाखाओंके ढेर ढेर । दिखाई देते अपार । फैले हुए ॥ ६० ॥ या फैला हो वृक्ष रूपसे गगन । या वृक्ष रूपसे वायु-प्रसरण । या अवस्था-त्रयका विस्तार मान । हुवा वृक्ष रूपसे ॥ ६१ ॥ ऐसा है यह ऊर्ध्व-मूल । फैला है सर्वत्र बहुल । विश्वाकार लेके सकल । जान तू यह ॥ ६२ ॥ अब है इसका ऊर्ध्व-भाग कौन । इसके ऊर्ध्व-मूलके क्या कारण । इसके अधो-वृद्धिके क्या लक्षण । औ' डालियां हैं कैसी ॥ ६३ ॥ अथवा इस वृक्षकी । जड कैसी है नीचेकी । डालियाँ कैसी ऊर्ध्वकी । सुनो आब ॥ ६४ ॥ तथा यह अश्वत्थ है ऐसे । प्रसिद्धिके कारण क्या कैसे । आत्म-विद्या-विदोंने है ऐसे । किया क्यों निर्णय ॥ ६५ ॥ यह सब तू अर्जुन । अनुभवेगा जो ज्ञान । ऐसे करूंगा कथन । सुन तू अब ॥ ६६ ॥ तेरा ही यह है सौभाग्य । इसके लिए है तू योग्य । आया है सुन यह भाग्य । सर्वांगके कान कर ॥ ६७ ॥ प्रेम-रसका ऐसे हो स्फुरण । यदु-पति बोला जब श्रीकृष्ण । प्रकट हुवा तब अवधान । अर्जुनके रूपमें ॥ ६८ ॥ अति व्यापक जो कृष्ण-कथन । किंतु फैला पार्थका अवधान । जैसे घेरती दिशायें महान । आकाशको जैसे ॥ ६९ ॥ अजी ! श्रीकृष्ण वचन सागर । प्राशन करता है धनुर्धर । मानो है अगस्ति ऋषि दूसरा । एक घोंटमें ॥ ७० ॥ फूट पडी ऐसी श्रवणाशा निर्मळ । पार्थमें प्रतीत कर कृष्ण सरळ । करता है देव वह सुख सकल । न्योच्छावर पार्थपै ॥ ७१ ॥ ज्ञानेश्वरी ५७६