ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिंतु अन्य वृक्ष सरीखा । नीचे मूल ऊपर शाखा । ऐसा नहीं जान इसका । अंत न लगता ॥ ४८ ॥ आग अथवा यदि कुठार । पड़ती जिसके मूल पर । वह पड़ता है टूटकर । कितना ही बड़ा हो ॥ ४९ ॥ मूल सब जब वृक्ष टूटता । शाखाओं सह वह है गिरता । किंतु इसका ऐसा नहीं होता । यह न है सहज ॥ ५० ॥ संसार वृक्षकी कल्पना-- इसका है अर्जुन ! कौतुक । कहनेमें यह अलौकिक । बढ़ता जाता है अधोमुख । यह वृक्ष ॥ ५१ ॥ जैसे सूर्यकी ऊंची नहीं जानता । उसका रश्मि-जाल नीचे फैलता । वैसे ही यह है आश्चर्य दिखाता । संसार-वृक्ष ॥ ५२ ॥ जैसे कल्पांतका उदक । फैलता है आकाश तक । वैसे यह संसार रुख । घेरता सर्वस्व ॥ ५३ ॥ अथवा होता रविका अस्त । तमसे घिरती सारी रात । यह वृक्ष ऐसा होता व्याप्त । आकाश सारा ॥ ५४ ॥ खाना चाहे तो नहीं फलता । सूंघना चाहे तो नहीं फूलता । जैसे हो यह वृक्ष रहता । केवल वृक्ष ॥ ५५ ॥ मूल जमा है इसका ऊपर । शाखयें फैली हैं नीचेकी ओर । किंतु नहीं पड़ा टूटकर । रहता खिला हुवा ॥ ५६ ॥ तथा ऊर्ध्व-मूल ऐसे । कहा है स्पष्ट रूपसे । किंतु फैलते नीचेसे । इसकी जड़ ॥ ५७ ॥ बढनेमें है जैसे शेवाल । ऊपर वट हो या पीपल । अंकुरमें फूटते हैं डाल । इसके सब ॥ ५८ ॥ इस भांति सुनो पार्थ । संसार-वृक्षके साथ । नीचे ही है डाल पात । ऐसे भी नहीं ॥ ५९ ॥ ५७५ पुरुषोत्तमयोग