भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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ज्ञानके लिए वैराग्य आवश्यक— तब विरक्तिके बिन । टिकता नहीं ज्ञान । निर्णय है यह जान । हरि चित्तका ॥ ३६ ॥ विरक्तिका कौनसा प्रकार । करेगा मनका अंगीकार । कर रखा यह भी विचार । सर्वज्ञ हरिने ॥ ३७ ॥ यह है विष मिश्रित अन्न । अतिथिको हो इसका ज्ञान । छोड़ उठता वह भोजन । इसी भांति ॥ ३८ ॥ अनित्य यह सब संसार । जानता है जो इसका सार । वह करता विरक्ति दूर । तो भी वह चिपकती ॥ ३९ ॥ पंद्रहवे अध्यायकी भूमिका— अनिश्चितताका रूप निश्चित । वृक्ष-रूपकसे है जगन्नाथ । सुनायेंगे सुने सब यथार्थ । पंद्रहवेंमें ॥ ४० ॥ सहज पडा जो हो उन्मूलन । डाली जड़ उलट कर जान । सूखेगा वह जैसे क्षण क्षण । वैसे नहीं यह ॥ ४१ ॥ मिटाते हैं ऐसा दिखाकर । रूपकका भला चमत्कार । जन्म-मरणका जो चक्कर । संसारका ॥ ४२ ॥ दिखाके संसारका अनित्यत्व । स्वरूपमें अहंताका लयत्व । कहा जायेगा अब सार-तत्व । पंद्रहवेंमें ॥ ४३ ॥ अब यहीं ग्रंथ हृद्गत । कहेंगे सिद्धांत विस्तृत । सुने आप देकर चित्त । श्रोतृ-वृंद ॥ ४४ ॥ वह ब्रह्मानंद समुद्र । जो पूर्ण-पूर्णिमाका चंद्र । तथा द्वारकाका नरेंद्र । कहता ऐसा ॥ ४५ ॥ अजी ! सुन तू पांडुकुमार । आते हुए स्वरूपके घर । रुकावट करता समीर । विश्वाभासका ॥ ४६ ॥ वह जो जगडंबर । नहीं है यहां संसार । जान महा तरुवर । पड़ा है यहां ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी : ५७४