भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 645, कुल 1172 में से

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चुल्हेपे चढाये हुए हरल । पक जाते अमृतसे चावल । भूखेका रखना यदि काल । जगन्नाथको ॥ २३ ॥ ऐसे ही जिसे श्रीगुरुवर । करते हैं जब अंगीकार । बन जाता है सारा संसार । मोक्षधाम ॥ २४ ॥ देखो कैसे नारायण । पांडवोंके अवगुण । बना देते हैं पुराण । विश्व-वंद्य ॥ २५ ॥ ऐसे श्री निवृत्तिराज । मुझ अज्ञानिमें आज । लाते हैं ज्ञानका ओज । स्व-कृपासे ॥ २६ ॥ रहने दे यह गुरु-गुण वर्णन । वर्णनसे होती है महिमा मलीन । गुरुवर्णनका मुझमें कहां ज्ञान । इसीलिए ॥ २७ ॥ उनकी कृपासे सदय । कहते गीता साभिप्राय । धोता हूं मैं आपके पूज्य । अब श्री चरण ॥ २८ ॥ करता चौदहका अंत । कह कर यह सिद्धांत । अर्जुनसे श्री भगवंत । कैवल्य पति जो ॥ २९ ॥ ज्ञानी ज्ञानसे मोक्ष पाता है— करता जो ज्ञान हस्तगत । मोक्ष पाता है वही समर्थ । होता इंद्रपद हस्तगत । जैसे शत-मखसे ॥ ३० ॥ अथवा लेकर शत जन्म । करता सतत ब्रह्म-कर्म । वही बनता अंतमें ब्रह्म । अन्य नहीं कोई ॥ ३१ ॥ या करता है सूर्य दर्शन । केवल मात्र एक नयन । वैसे केवल ज्ञानसे मान । मोक्ष प्राप्त ॥ ३२ ॥ ऐसे ज्ञान के लिए कौन । होता यहां सामर्थ्यवान । खो जानेसे हुवा दर्शन । अकेलेका ॥ ३३ ॥ पातालमें भी जो है निधान । दिखाएगा लगाके अंजन । इसके लिए होना लोचन । पाव्जके ही ॥ ३४ ॥ वैसे ही मोक्ष देगा ज्ञान । यहां बात नहीं भिन्न । इसके लिए होना मन । परम-शुद्ध ॥ ३५ ॥ ५७३ पुरुषोत्तमयोग

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