ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 644, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेता अंतिम-विश्रांति-स्थान । वहां तक खिलता जो ज्ञान । बनाता सुधा-सिंधु महान । वाचाका वह ॥ १० ॥ असंख्य पूर्ण-सुधाकर । करें जिसपे न्योच्छावर । होता है वक्तृत्व मधुर । जिस दैवसे ॥ ११ ॥ सूर्य उदय जो पूर्व-दिशा । देती है जगतको प्रकाश । करती दीवाली ज्ञान-दशा । वैसे श्रोताओंकी ॥ १२ ॥ जिससे स्फुरता है व्याख्यान । लगता नाद-ब्रह्म भी बौना । मोक्ष-धाम भी है शोभा-हीन । उसके सम्मुख ॥ १३ ॥ मंडपमें श्रवण सुखके । जगतको वसंत ऋतुके । सुख मिले व्याख्यान-वल्लीके । ऐसा बहार आता ॥ १४ ॥ नहीं लगनेसे जिसकी थाह । लौटती है वाचा मनके सह । उसके शब्दमें आता है वह । कितना आश्चर्य ॥ १५ ॥ ज्ञान जिसे नहीं जानता । ध्यानमें भी जो नहीं आता । वह है अगोचर रमता । उसकी गोष्ठियोंमें ॥ १६ ॥ इतना बड़ा जो सौभग । बनता है वाचाका अंग । गुरु-पद-पद्म-पराग । प्राप्त होता ॥ १७ ॥ ऐसा यह भाग्य है नहीं । मेरे बिन अन्यको कहीं । कहता है आपसे यहीं । ज्ञानदेव ॥ १८ ॥ रहा हूं अबोध बालक । श्रीगुरुका इकलौता एक । इसी लिए कृपा स्वाभाविक । मिली मुझको मात्र ॥ १९ ॥ मेघमाला जैसे संपूर्ण । देती है चातकको प्राण । मेरे लिए गुरु-चरण । बने वैसे ॥ २० ॥ तभी मेरा रीता ही मुख । करने लगा बकबक । किंतु निकला स्वाभाविक । गीता तत्व मधुर ॥ २१ ॥ होता है जब दैव अनुकूल । रेती बनते मोति अनमोल । शत्रु भी बन जाते हैं सकल । ऐश्वर्य सह मित्र ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ५७२