ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५ पुरुषोत्तम-दर्शनयोग श्रीसद्गुरुकी मानस-पूजा— अपना यह अंतःकरण । बना करके श्रीसिंहासन । उस पर रखेंगे चरण । श्रीगुरुके ॥ १ ॥ ऐक्य भावकी अंजली । इंद्रिय-कमल-कली । भरकर पुष्पांजली । देंगे अर्घ्य ॥ २ ॥ अनन्यता-उदक शुद्ध । संस्कार निष्ठाका सु-सिद्ध । लगावें अनामिका गंध । चंदन-तिलक ॥ ३ ॥ स्वर्णिम प्रेमके नूपुर । श्रीचरणमें सुकुमार चढायें समर्पित कर । विशुद्धतासे ॥ ४ ॥ अनन्यतासे जो है दृढ । अव्यभिचारका निचोड़ । बनाके चरणोंके जोड़ । चढ़ायेंगे ॥ ५ ॥ आनंद-मोद बहुल । सात्विकताके मुकुल । खिले हुए अष्ट-दल । चढायें पदपे ॥ ६ ॥ जलायें अहंका धूप । उतारें नाहंका दीप । समरस होके आप । मिले निरंतर ॥ ७ ॥ बनाके मेरे तन औ' प्राण । चढाऊं पादुका श्रीचरण । करूं भोग-मोक्षका निंब-लोण । उन चरणों पर ॥ ८ ॥ इन गुरु-चरणोंकी सेवा । देती सकल पुरुषार्थ मेवा । प्राप्त हो हम वह सुदैव । ऐसा करें हम ॥ ९ ॥