ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअर्जुनकी जिज्ञासा, गुणातीत कैसे होता है ?-- उसी तोषसे पूछता अर्जुन । दीखते उसके क्या लक्षण । जिसमें बसता है ऐसा ज्ञान । कह तू श्रीहरि ॥ २० ॥ उसका होता कैसा आचरण । करता कैसे गुण-निस्तरण । कृपाका तू नैहर श्रीकृष्ण । यह कह कृपाकर ॥ २१ ॥ अर्जुनका सुन यह प्रश्न । षड्गुणैश्वर्य-युत श्रीकृष्ण । उत्तर देता है कृपा-पूर्ण । सुनिये अब ॥ २२ ॥ विचित्र है तेरी यह बात । पूछता तू प्रश्न विसंगत । यह सत्य कैसे असत् पार्थ । ऐसा यह प्रश्न ॥ २३ ॥ जिसका नाम गुणातीत । नहीं होता गुण-संयुत । होता भी यदि गुण-युत । मुक्त रहता वह ॥ २४ ॥ कृष्ण प्रश्नका वास्तविक रूप समझाता है -- किंतु गुणमें है उलझता । तब गुणाधीन वह होता । अथवा गुण-मुक्त रहता । जानना कैसे ॥ २५ ॥ ऐसा है यदि तेरा प्रश्न । पूछ तू सुखसे अर्जुन । करता हूं समाधान । तेरे संदेहका ॥ २६ ॥ भगवान् उवाच प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२ ॥ गुणोंके कल्लोलमें वह निर्लिप्त रहता है- जब रजोगुणका मद । देहमें लाता कर्म साध । प्रवृत्ति लेती है उसे बांध । कर्मांकुरसे ॥ २७ ॥ श्री भगवानने कहा प्रकाश मोह उद्योग गुण-कार्य स्वभाविक । पानेसे न करे खेद न धरे चाह लोपसे ॥ २२ ॥ (71) ५६१ गुण-निस्तारयोग