ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंखर्च किया आज ऐसा । कलका चलेगा कैसा । इससे बहु बडा-सा । करेगा उद्यम ॥ ६५ ॥ दमडी पर जीवन । दे करके बलिदान । कमाकर एक तृण । मानता धन्य ॥ ६६ ॥ कहता स्वर्गपे जाना । सोचता कहां क्या खाना । यज्ञानुष्ठान करना । इसीलिये ॥ ६७ ॥ सदा व्रत पर व्रत । करता इष्ट प्राप्त्यर्थ । कभी कामना रहित । न करता कुछ ॥ ६८ ॥ जैसा है ग्रीष्मका पवन । न ही जानता शांति-क्षण । रहता वह निशिदिन । ऊधमग्रस्त ॥ ६९ ॥ होता है चंचल मीन । या कामिनी कटाक्ष समान । या बिजलीकी गति मान । रहता प्रवृत्तिमें ॥ १७० ॥ चाहता इसी वेगसे । संसार स्वर्ग भी वैसे । क्रियाकी आगमें वैसे । घुसता वह ॥ ७१ ॥ देहमें या देहसे भिन्न । तृष्णा श्रृंखलाके बंधन । सदा उपद्रुव्याप विभिन्न । गलेमें व्यापारके ॥ ७२ ॥ रजो गुणका यह दारुण । देहमें देहीके है बंधन । सुन तू अब कथा अर्जुन । तमो गुणकी ॥ ७३ ॥ तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥ ८ ॥ तमोगुणके लक्षण- व्यवहारके जो नयन । बंद होते जिससे जान । मोह-रात्रीके हैं जो घन । काले अतिशय ॥ ७४ ॥ मोहता तम देहीको अज्ञानको बढाकर । निद्रा प्रमाद आलस्य इससे घेर बांधता ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ५४६