ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 597, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो न रीता या भरित । न रहित या सहित । मूर्त नहीं या अमूर्त । शून्यत्वसे ॥ ९ ॥ जो न आनंद या निरानंद । न है एक अथवा विविध । न है जो मुक्त अथवा बद्ध । आत्मत्वसे ॥ ११० ॥ न वह इतना या उतना । न स्वत सिद्ध या न है बना । न है वक्ता अथवा मौन । अलक्षत्वसे ॥ ११ ॥ सृष्टि-साथ यह नहीं बनता । या प्रलयके साथ न नाशता । होने न होनेसे परे रहता । लय स्थान जो ॥ १२ ॥ अगणित अथवा अचर्चित । मिटता न होता वृद्धिगत । न घटता न होता विकृत । अव्यवत्वसे ॥ १३ ॥ इस भांति है यह आत्मा । देहमें कहते प्रियोत्तम । मवाकाशमें जैसे व्योम । नाम जिसका ॥ १४ ॥ ऐसे उस अखंड पर । बनते देहके आकार । वह न ले या तजकर । रहता सहज ॥ १५ ॥ आत्मा शरीरमें रहकर भी न कुछ करता न लीपता— जैसे प्रकाश और अंधकार । आते जाते आकाशपर । शरीर है आत्म-तत्व ˙पर । इसी भांति ॥ १६ ॥ इस देहमें न कुछ करता । अथवा वह न कुछ कराता । सहज व्यापारमें न गूंथता । कर्त्ता पनसे ॥ १७ ॥ इसीलिये वह स्वरूपसे । अल्पता अथवा पूर्णतासे । न लीपता है कभी देहसे । देहमें भी ॥ १८ ॥ यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ ३२ ॥ आकाश ज्यों सर्व-व्यापी न लीपे सूक्ष्म होकर । व्याप्त सर्वत्र त्यों आत्मा देहमें लीपता नहीं ॥ ३२ ॥ ५२५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग