भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 596, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 596

दर्पणमें मुख जैसे । बिंबित है यह वैसे । रहता देहमें वैसे । आत्म-तत्त्व ॥ ९६ ॥ संबंध जो देह-आत्मका । सर्वथा निर्जीव बातका । होता क्या बात औ' रेतिका । संबंध पार्थ ॥ ९७ ॥ आग तथा पंखमें जैसे । नत्थी करना कहो कैसे । या पत्थरको आकाशसे । कैसे जोडना ॥ ९८ ॥ एक जाता पूर्वकी ओर । दूसरा पश्चिमकी ओर । भेंट होती कैसी आखर । दोनोंकी पार्थ ॥ ९९ ॥ प्रकाश और अंधार । निर्जीव सजीव नर । तथा आत्मा औ' शरीर । एक समान ॥ ११०० ॥ रात्र और दिवस । कनक औ' कपास । नाता कैसा है वैसा । इन दोनोंका ॥ १ ॥ देह यह है पांचोंका जाल । गुण-कर्मकी गांठ केवल । जन्म-मृत्यु चक्र पर डाल । घुमाई जाती है ॥ २ ॥ कुंडमें जैसे कालानलके । गोले पडे हैं नवनीतके । हिलनेमें ही पांव माखिके । जाते पिघल ॥ ३ ॥ पडनेसे यह आगमें । भस्म हो उडता क्षणमें । जानेसे श्वान उदरमें । होता है मल ॥ ४ ॥ इन दोनोंसे यदि चूकता । कृमियोंका पुंज बनता । इसका परिणाम है पार्थ । कल्मष ही है ॥ ५ ॥ इस देहकी यह दशा । तथा आत्मा है वह ऐसा । नित्य-शुद्ध-सिद्ध एकसा । अनादित्वसे ॥ ६ ॥ सकल नहीं है या यह निष्कल । न अक्रिय या यह क्रिया-शील । नहीं यह कृश अथवा स्थूल । निर्गुणत्वसे ॥ ७ ॥ आभास नहीं या निराभास । प्रकाश नहीं या अप्रकाश । न अल्प अथवा बहुवस । अरूपतासे ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ५२४