ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसभी यह तीनों जान । कार्य कर्तृत्व कारण । प्रकृति मूल श्रीकृष्ण । कहता यहां ॥ ७१ ॥ ऐसे तीनोंके ही समन्वयसे । प्रकृति होती है कर्म-रूपसे । फिर जो गुण बढ़ाता है जैसे । लेती है वह रूप ॥ ७२ ॥ सत्व-गुणसे जो बनता । वह सत्कर्म कहलाता । रजसे जो है निपजता । वह है मध्यम ॥ ७३ ॥ जिसका आधार है तम । ऐसे होते हैं सब काम । कहलाते हैं वे अधम । जान तू यहां ॥ ७४ ॥ ऐसे होते हैं प्रकृतिसे । भले बुरे कर्म जो जैसे । उत्पन्न होते हैं उनसे । सुख दुःख ॥ ७५ ॥ असत्कर्मसं दुःख उत्पन्न । सत्कर्मसे है सुख अर्जुन । उन दोनोंको कहते जान । भोग पुरुषका ॥ ७६ ॥ सुख दुःख सब जब तक । सच मानते हैं तब तक । प्रकृति कर्मरत है देख । औ' पुरुष भोगता ॥ ७७ ॥ प्रकृति पुरुषका संसार । अति असंगत धनुर्धर । लाती है भार्या जो कमाकर । खाता है भर्त्ता ॥ ७८ ॥ तथा भर्त्ता भार्या परस्पर । नहीं करते संग संसार । और सुनो यह चमत्कार । प्रकृति जनती जग ॥ ७९ ॥ पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् । कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २१ ॥ प्रकृतिके गुणोंसे होने वाला भास— यह भर्त्ता है निराकार । निष्क्रिय निर्गुण है और । जरा-जीर्ण है धनुर्धर । वृद्धातिवृध्द ॥ ९८० ॥ बंधा है प्रकृतीसे जो उसके गुण भोगता । शुभाशुभ जन्म पाता प्रकृति-संगसे यह ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी ५१२