ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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दोनो रहते हैं वैसे साथ । प्रकृति-पुरुष होते व्यक्त । परस्पर चिपके हैं पार्थ । अनादि सिद्ध ॥ ६१ ॥ जिसका नाम क्षेत्र । कहा है एक-मात्र । जानता है सर्वत्र । प्रकृति उसे ॥ ६२ ॥ तथा क्षेत्रज्ञ है ऐसे । कहा है जिसको उसे । मानता पुरुष उसे । यह है स्पष्ट ॥ ६३ ॥ इनके हैं ये नाम भिन्न । किंतु तत्व एक अर्जुन । न भूलना यह लक्षण । यहां कभी ॥ ६४ ॥ रही है यहां जो सत्ता । वही पुरुष है पार्थ । प्रकृति नाम समस्त । क्रिया मात्रका ॥ ६५ ॥ बुध्दि-इंद्रिय-अतःकरण । इत्यादि है विकार भरण । तथा रहे हैं वे तीनों गुण । सत्व रजादिक ॥ ६६ ॥ इन सबका मिलन । प्रकृतिसे हुवा जान । इसीसे होते उमझ । सभी कर्म ॥ ६७ ॥ कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ २० ॥ वहां इच्छा बुध्दि सहित । अहंकार सह घाटित । उसे चस्का लगाते पार्थ । करणोंका ॥ ६८ ॥ यही कारण करने संपन्न । जिन उपयोंका सूत्र चालन । उसको कहते सुन अर्जुन । कार्य है यह ॥ ६९ ॥ तथा इच्छा मदके द्वारा । प्रकृतिने मन उभारा । औ' इंद्रियोंका व्यवहार । वह है कर्तृत्व ॥ १७० ॥
कहा प्रकृतिके पास कर्तृत्व देह-इंद्रिका । तथा पुरुषके पास भोक्तृत्व सुख दुःखका ॥ २१ ॥ ५११ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग