ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएक क्षेत्र औ' एक ज्ञान । एक ज्ञेय एक अज्ञान । भाग किये ये तेरी जान । ग्रहण-शक्ति ॥ ५१ ॥ किंतु इस भांतिसे भी पार्थ । मंतव्य समझमें न आता । तब यह दूसरी व्यवस्था । कहता तुझे ॥ ५२ ॥ चार भाग यहां नहीं करूंगा । एक ही तत्व नहीं कहूंगा । आत्मानात्म विचार कहूंगा । अब तुझसे ॥ ५३ ॥ किंतु तुझे इतना करना । ध्यान पूर्वक बात सुनना । श्रवणोंका है नाम रखना । अपना ही ॥ ५४ ॥ सुनकर कृष्ण वचन पार्थ । प्रसन्न-मन हुवा रोमांचित । कृष्ण मानता हुई है अंकित । बात इनपे ॥ ५५ ॥ इससे हुवा भावावेग । समेट कहता श्रीरंग । प्रकृति-पुरुष विभाभ । कहता हूं सुन ॥ ५६ प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धयनादी उभावपि । विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ १९ ॥ कहते जिसे योगी-जन । सांख्य-योग इसे अर्जुन । जिसको कहनेमें मान । हुवा मैं कपिल ॥ ५७ ॥ सुन तू अब निर्दोष । प्रकृति-पुरुष विवेक । कहता है आदि पुरुष । अर्जुनसे वहां ॥ ५८ ॥ प्रकृति प्रेरित कर्मका भोक्ता— पुरुष अनादि है साथी । उसकी रही है प्रकृति । जैसे है दिवस औ' राति । दोनों अनादि ॥ ५९ ॥ रूप नहीं होता व्यर्थ । छाया होती उसके साथ । दाने सह भूसा भी पार्थ । बढता जैसे ॥ १६० ॥ प्रकृति-पुरुषकी है जोडी जान अनादि तू । होते प्रकृतिके द्वारा विकार गुण है सब ॥ १९ ॥ ज्ञानेश्वरी ५१०