भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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आत्माके एकत्वका विवेचन-आत्मानात्म विचार- इस प्रकारसे पार्थ । पहिलेसे ही निश्चित । स्पष्ट किया क्या है खेत । विवेचनसे ॥ ३९ ॥ वैसे ही क्षेत्र-दर्शन । करने दिये नयन । कहते हैं जिसे ज्ञान । कहा वह भी ॥ ४० ॥ वैसे ही अज्ञान लक्षण । किये सविस्तर वर्णन । जिसे सुनकर अर्जुन । थका होगा तू ॥ ४१ ॥ तथा स्पष्टतासे पार्थ । कहा देकर दृष्टांत । ज्ञेय-स्वरूप निश्चित । समझाके ॥ ४२ ॥ यह जो विवेचन संपूर्ण । करता है हृदय ग्रहण । मत्सिद्धि भावना प्राण । करता सहज ॥ ४३ ॥ तब देहादिका परिग्रह । होता है संन्यास निराग्रह । तथा प्राण होता निरीह । सेवक मेरा ॥ ४४ ॥ तब वे मैं ही हूं अर्जुन । अंतिम आसरा है जान । कर मुझे चित्त अर्पण । होते मद्रूप ॥ ४५ ॥ मद्रूप होनेका पथ । .रचाया सुन तू पार्थ । सुलभ और निश्चित । हमने यह ॥ ४६ ॥ चढनेमें जैसे सीढी रचते । अथवा ऊपर मंच बांधते । तथा अपनी नांव भी रखते । तैरने पूरमें ॥ ४७ ॥ सब कुछ है यदि यहां आत्मा । ऐसा कहता तो मैं वीरोत्तम । ग्रहण न करना मनो-धर्म । यह बात मेरी ॥ ४८ ॥ इसीलिये था जो एकाकार । कर बताये चार प्रकार । देखके तेरी पांडुकुमार । मंद बुद्धि ॥ ४९ ॥ शिशुको जब खिलाते । ग्रास बीस कर देते । वैसे ही चार कहे ये । हमने एकके ॥ ५० ॥ ५०९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग