भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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आज्ञा देता है धरणीधर । मेरा अभिप्राय स्पष्ट कर । छिपा रखा शब्दके भीतर । हमने यहां ॥ ५५ ॥ परमात्माका मनोरथ । हमें दिखाता है तू मूर्त । यह कहने पर चित्त । उमड आयेगा ॥ ५६ ॥ इसलिये यह नहीं कहते । किंतु कहनेसे नहीं रहते । श्रवण-सुखसे हैं हम पाते । ज्ञान-नौका यहां ॥ ५७ ॥ अब तू इस पर । कहता जो श्रीधर । हमें कह सत्वर । जो यथार्थ ॥ ५८ ॥ सुन कर यह संतोंका बचन । बोले निवृत्तिदास मुदित मन । करो ध्यानसे चित्त देके श्रवण । कहा जो श्रीहरिने ॥ ५९ ॥ कहते हैं तुझको अर्जुन । यह चिन्ह समुच्चय पूर्ण । श्रवण किया यह अज्ञान । मूर्ति रूप था ॥ ८६० ॥ अज्ञानसे मुडकर । ज्ञानमें पांडुकुमार । निश्चय कर सत्वर । दृढतासे तू ॥ ६१ ॥ उस ज्ञानसे अर्जुन । होगा ज्ञेयका दर्शन । सुन अर्जुनका मन । करता जिज्ञासा ॥ ६२ ॥ तब वह सर्वज्ञ-श्रेष्ठ । जानके यह भाव स्पष्ट । अभिप्राय कहके तुष्ट । करेगा ज्ञेयका ॥ ६३ ॥ ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते । अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ १२ ॥ ज्ञेयका स्वरूप- जिसको यह ज्ञेय कहना । उसका कारण है इतना । वह जो कभी ज्ञानके बिना । जाना नहीं जाता ॥ ६४ ॥ कहूँगा ज्ञेय मैं सारा पानेसे अमृतत्व है । अनादि जो पर ब्रह्म है परे अस्तिनास्तिके ॥ १२ ॥ ५०१ क्षेत्र--क्षेत्रज्ञयोग

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