ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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तथा उसको जानने पर । रहता नहीं कर्तव्य फिर । उससे मिलती निरंतर । तद्रूपता ॥ ६५ ॥ उस ज्ञान प्राप्तिके नंतर । संसार रहता तट पर । डूबा ही रहता निरंतर । नित्यानंदमें ॥ ६६ ॥ ज्ञान होता है ऐसे । आदी न होती जिसे । पर-ब्रह्म है ऐसे । कहते उसको ॥ ६७ ॥ इसको यदि नहीं कहते । विश्वाकारसे इसे देखते । यदि इसे विश्व ही कहते । विश्व है माया ॥ ६८ ॥ रूप वर्ण तथा व्यक्ति । नहीं दृश्य द्रष्टा स्थिति । वह है ऐसी जो मति । होगी किसकी ॥ ६९ ॥ और यदि यह नहीं है । महदादि तत्व कैसे हैं । कहांसे स्फुरण होते हैं । यह प्रश्न उठता ॥ ८७० ॥ तभी हैं अस्ति नास्ति ये जोड । देख यह मूक होते फोल । विचारकी चहल पहल । रुक जाती है ॥ ७१ ॥ जैसे घटका मटकाकार । बन रहती पृथ्वी साकार । वैसे सबमें सब होकर । रहता ज्ञेय ॥ ७२ ॥ सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥ सभी स्थल-कालमें उनसे । भिन्न नहीं होते स्थल-कालसे । होती स्थूल सूक्ष्म क्रिया भूतोंसे । हाथोंसे उनके ॥ ७३ ॥ उसको इसी कारणसे । कहते विश्वबाहू ऐसे । जो सर्वत्र सर्व-रूपसे । करता सदैव ॥ ७४ ॥
दीखते पद हस्तादि सर्वत्र उसके शिर । मुख आंख तथा कान सबको घेरके रहे ॥ १३ ॥ ज्ञानेश्वरी ५०२