ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस तीरको भी जो न पाता । तीर देखके भी भाग जाता । पैल तीरकी वह क्या वार्ता । जानेगा भला ॥ ४३ ॥ या देहरी पर ही उसका सिर । दबाया कंगूरमें जकडकर । देखेगा कैसा वह पांडुकुमार । अंर्तगृहकी बात ॥ ४४ ॥ आत्म-ज्ञानकी पहचान । नहीं है उसको अर्जुन । जानेगा कैसा सत्य-ज्ञान । विषय भी वह ॥ ४५ ॥ तभी इसमें विशेष । तत्व नहीं है देख । कहना तुझे शेष । रहा ही क्या ॥ ४६ ॥ जैसे स-गर्भाको पगेसा अन्न । उससे बढता गर्भका तन । पिछले पदमें किया वर्णन । वही है सब ॥ ४७ ॥ अंधेको दिया जब निमंत्रण । उसके संग आता स-नयन । जाने है अज्ञान लक्षण । ज्ञान भी आया ॥ ४८ ॥ ज्ञेयकी पूर्व-पीठिका— तभी तो यहां अर्जुन । कहे अज्ञान लक्षण । अमानित्वादिके जान । हैं विरुद्ध जो ॥ ४९ ॥ ज्ञानके जो अठराह लक्षण । उसके उलटकर दर्शन । करनेसे दीखेगा अज्ञान । सहज भावसे ॥ ८५० ॥ पीछे श्लोकार्धमें एक । कहा है श्रीकृष्णने देख । उलटके ज्ञानको देख । वही है अज्ञान ॥ ५१ ॥ तभी इस पद्धतिको स्वीकार । किया है उस अर्थका विस्तार । न तो दूधमें मिलाकर नीर । न फैलाता ऐसे ॥ ५२ ॥ वैसे दिखायी नहीं वाचालता । शब्दकी सीमामें हूं मैं स्पष्टता । बना मूल-ध्वनिके विस्तारार्थ । निमित्तमात्र ॥ ५३ ॥ तब कहते हैं श्रोता जन । अनावश्यक स्व-समर्थन । विस्तार भीति है अकारण । कवि पोषक अपनी ॥ ५४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५००