ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजानता है सभी नीति । वैद्यकमें खासी गति । काव्यमें है पक्व-मति । तथा न्यायमें भी ॥ ३१ ॥ होता स्मृतियोंका तज्ञ । गारुडी विद्याका मर्मज्ञ । शब्दकोशका महा-प्राज्ञ । माना कोश है दास ॥ ३२ ॥ व्याकरण-ज्ञानमें अगाध । तर्क-शास्त्रका है पूर्ण बोध । किंतु आत्म-ज्ञानमें जन्मांध । होता है धनंजय ॥ ३३ ॥ इस एकके बिन जो सभी शास्त्र । जानता वह मूल सिद्धांत-सूत्र । जलने दो लगा है मूला नक्षत्र । न देखो वह ॥ ३४ ॥ मोर-पंखके शरीर पर । उसपे होती आंख सुंदर । दृष्टि नहीं होती एक पर । वैसा है यह ॥ ३५ ॥ अध्यात्म-ज्ञानके बिन सब व्यर्थ— यदि परमाणु जितना । संजीवनी जड पा जाना । अन्य औषध क्या करना । ढेरोंका जो ॥ ३६ ॥ आयुष्य बिन सब लक्षण । अथवा शरीर बिन आभूषण । बरात जैसे वैभव-पूर्ण । दूल्हा बिन निंदित ॥ ३७ ॥ सब शास्त्र वैसे ज्ञान । सर्वथा है अप्रमाण । अध्यात्म ज्ञान बिन । स्वयंपूर्ण जो ॥ ३८ ॥ इसीलिये जान तू अर्जुन । जो है अध्यात्म-बोध विहीन । उसको कहते प्राज्ञ जान । शास्त्र-मूढ ॥ ३९ ॥ मानो उसका जो शरीर । अज्ञान-बीजका अंकुर । उसका हुवा जो विस्तार । अज्ञान-वृक्ष ॥ ८४० ॥ होते हैं उसके सभी बोल । आज्ञानके खिले हुये फूल । फले तो उसके पुण्य-फल । अज्ञानके ही ॥ ४१ ॥ अध्यात्ममें जिसे रस नहीं । उसको ज्ञेय दीखता नहीं । यह कहना अवश्य नहीं । जान तू यह ॥ ४२ ॥ ४९९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग