भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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नवमीमें है मंडन । नव-चंडीका पूजन । रविवारमें भोजन । भैरवका ॥ १९॥ जब आता है सोमवार । दौड जाता शिव-मंदिर । करे तुष्ट इस प्रकार । सबको वह ॥ ८२०॥ करता अखंड भजन । क्षण भी न रहता मौन । जैसी है ग्राम-सुहागन । रहती है वैसे ॥ २१ ॥ ऐसा होता यह भगत । सभीके पूजामें है रत । जान अज्ञान मूर्तिमंत । अवतरा है ॥ २२ ॥ १६-१७ अज्ञानका लक्षण, एकांतमें अरुचि जनसंगमें प्रीति— शुचि सु-चित एकांत सुंदर । तपोबन या तीर्थ देखकर । मुरझाता मनमें निरंतर । अज्ञानरूप जो ॥ २३ ॥ जन-संगमें जिसको सुख । भाता है अतिशय लौकिक । गडबडमें जो स-कौतुक । रहता सदैव ॥ २४ ॥ जिससे आत्मा होती है गोचर । उस विद्याका नाम सुनकर भाग जाता है गडबडाकर । ऐसा विद्वान वह ॥ २५ ॥ उपनिषद नहीं पढता । योग-शास्त्र उसे न रुचता । अध्यात्म-ज्ञानमें न पैठता । चित्त उसका ॥ २६ ॥ आत्म-चर्चाका नाम सुनकर । भागता जैसा रस्सी तोडकर । चौपाया वैसे वह चौंककर । लांघ श्रद्धा-सीमा ॥ २७ ॥ कर्म-कांड वह सब जानता । पुराण सब मुखोद्गत गाता । ज्योतिषयमें जो प्रवीण बनता । पारंगत जैसे ॥ २८ ॥ शिल्पमें अति निपुण । पाक-कर्ममें प्रवीण । जानता है अथर्वण । विधि समस्त ॥ २९ ॥ काम-शास्त्रमें मति सिद्ध । भारत पाठ तो प्रसिद्ध । आगम-शास्त्रमें विशुद्ध । किया अपनासा ॥ ८३० ॥ ज्ञानेश्वरी ४९८

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