ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसा जिसका चित्त । विषम होता पार्थ । होके भी बुध्दिवंत । अज्ञानी वह ॥ ६ ॥ फलमें रखके आसक्ति । करता वह मेरी भक्ति । जैसे करते हैं धनार्थी । विरक्तिका स्वांग ॥ ७ ॥ अथवा पतिके मनमें घुसकर । उसका विश्वास संपूर्ण पाकर । यत्न करती जाना जारके घर । स्वैरणी जैसे ॥ ८ ॥ जैसे मेरी उपासना । मनमें भोग-कामना । करता है वह अर्जुना । विषयार्थी हो ॥ ९ ॥ ऐसी भक्ति करने पर । फलको नहीं प्राप्त कर । छोड़ता है सब सत्वर । निरर्थक मान ॥ ८१० ॥ नित नयी भूमी किसान । बुआयी करता अर्जुन । ऐसे वह देवतार्चन । करता सदैव ॥ ११ ॥ देख किसी गुरुकी शान-मान । करता उसका मार्गानुगमन । तथा अन्योंको अति-क्षुद्र मान । उसका मंत्र लेता ॥ १२ ॥ प्राणि-जातसे जो निष्ठुर । पूजता है मूर्ति-स्थावर । ऐसी भक्ति तो अपार । निष्ठा कहीं नहीं ॥ १३ ॥ मेरी मूर्ति है बनवातां । घरके कोनमें रखता । आप यात्रामें है जाता । तीर्थ-क्षेत्रकी ॥ १४ ॥ प्रति-दिन मेरा आराधन । कार्यमें कुलदेवतार्चन । करता अन्य-देव पूजन । पर्व विशेषमें ॥ १५ ॥ घरमें है मेरा अधिष्ठान । अभिष्ठयर्थ अन्यका पूजन । पित्र-कार्यमें होता तर्पण । पितरोंका भी ॥ १६ ॥ जैसे एकादशीका पूजन । होता वैभवसे मेरा जान । वैसे नगापंचमीके दिन । नागोंका भी ॥ १७ ॥ गणेश-चतुर्थी देवता । गणेशका भक्त बनता । चतुर्दशी देख कहता । जै दुर्गे तेरा मै ॥ १८ ॥ ४९७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग (63)