भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जैसे अपनेको थकाता । जो है दूसरोंका दुखाता । कवडी कवडी गिनता । लोभी जैसा ॥ ९३ ॥ दान-पुण्यको धता बताता । इष्ट-मित्रोंको सदा फंसाता । स्त्रीकी बात है पूरी करता । नहीं करता न्यून ॥ ९४ ॥ देवतोंसे समझौता । गुरुजनोंको छकाता । मां-बापको न कहता । सदैव ही ॥ ९५ ॥ किंतु वह स्त्रीके हेतु । लाता सभी भोग-वस्तु । भरता उससे वास्तु । जहां जो देखी ॥ ९६ ॥ प्रेमसे जैसे भजता भक्त । सदा अपना कुल-दैवत । वैसे हो वह एकाग्र-चित्त । पूजता स्त्रीको ॥ ९७ ॥ स्त्रीके लिये भला पूरा । ला देता है सदा सारा । औरोंको सभी प्रकार । छकाता रहता ॥ ९८ ॥ उसको कोयी देखेगा । तथा कोयी बिगडेगा । जग ही डूब जायेगा । ऐसा मानता ॥ ९९ ॥ जैसे कभी खसरा होगा । नाग मनौती न तोडेगा । वैसे स्त्रीकी पूरी करेगा । सभी मांग ॥ ८०० ॥ स्त्री ही सर्वस्व है जिसका । अन्य कुछ न है उसका । आप्तोंसे स्नेह भी उसका । उसीके लिये ॥ १ ॥ जो है अन्य भी समस्त । उसीका संपत्ति-जात । जीबसे भी वह आप्त । मानता जो ॥ २ ॥ अज्ञानका है वही मूल । अज्ञानको उसीसे बल । रहता है वह केवल । अज्ञान-रूप ॥ ३ ॥ उफान-भरे सागर पर । नाव जैसे बिन-पतवार । हिलोरे लेती लहर पर । वैसे चित्त ॥ ४ ॥ जब वह प्रिय-वस्तु पाता । अति-सुखसे गगन छूता । तथा अप्रियसे पहुंचता । रसातलको ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ४९६