भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 567, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 567

१५ अज्ञानका लक्षण, सदा विषय-सेवन— अनुराग जिसका संपूर्ण । उलझा हुवा घरमें जान । जिस भांति भ्रमर अर्जुन । नवगंध केसरमें ॥ ८१ ॥ देख जैसा शर्कराका ढेर । न उठे मक्षिका बैठकर । वैसे रमणीमें रमकर । न उठे चित्त ॥ ८२ ॥ जैसे पानीमें मेंढक । तथा श्लेष्ममें मशक । कीचड़में फंसा देख । चौपाये जैसे ॥ ८३ ॥ वैसे घरसे कभी निकलना । नहीं करता जीव मन प्राण । जैसे सांप बेंबीमें दे आसन । बैठा ही रहता ॥ ८४ ॥ जैसे प्रमदा बन कंठहार । पकड बैठती है प्रियकर । वैसे अपनी कुटियाका द्वार । पकड बैठता यह ॥ ८५ ॥ मधुर रसके उद्देश्यसे । खपता है मधुकर जैसे । गृह-संगोपनमें भी वैसे । रहता है यह ॥ ८६ ॥ जब बुढापेमें है होता । दैवसे पुत्र इकलौता । उससे जैसे प्रेम होता । माता-पिताका ॥ ८७ ॥ उसी प्रेमसे होती पार्था । घरमें उसकी जो आस्था । बिना स्त्रीके वह सर्वथा । न जाने कुछ ॥ ८८ ॥ जैसे स्त्री-देहमें वह जीव । भजता रहता सर्व-भाव । कौन मैं कर्तव्य क्या स्वभाव । भूलता है ॥ ८९ ॥ महा पुरुषका जो चित्त । बनके ऐसा वस्तुगत । भूलता व्यवहार-जात । उसी भांति ॥ ८९० ॥ हानि लाज नहीं देखता । परापवाद नहीं सुनता । सर्वेंद्रियोंसे जो रमता । स्त्रीमें एकाग्र हो ॥ ९१ ॥ चित्त करता है स्त्री-आराधन । तथा उसकी धुनमें नर्तन । जैसे मर्कट हो आज्ञाधीन । मदारीके जैसे ॥ ९२ ॥ ४९५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 567, कुल 1172 में से · BharatKosha