भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 566, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 566

तथा स्त्री-पुत्रके साथ । भोगता है संपदा पार्थ । रजसे होता है उन्मत्त । विषयोंमें जो ॥ ६८ ॥ इसके साथ वियोग भी होगा । वैसे ही कोयी संकट आयेगा । इस भांति वह नहीं देखेगा । विचारसे ॥ ६९ ॥ उसीको अज्ञानी जान । तथा वही अर्जुन । देता है यथेच्छ अन्न । इंद्रियोंको ॥ ७० ॥ तारुण्य मदमें न देखता । संपत्तिके साथ ही बहता । सेव्य असेव्य नहीं मानता । ऐसा कभी ॥ ७१ ॥ करना नहीं वही करता । असंभाव्य मनमें धरता । अ-सोचका चिंतन करता । जिसका मन ॥ ७२ ॥ नहीं घुसना वहीं घुसता । जो न चाहना वही मांगता । नहीं छूना उसीसे मिलता । जिसका मन अंग ॥ ७३ ॥ नहीं जाना वहीं है जाता । न देखना वह देखता । नहीं खाना वही खाता । संतोषसे जो ॥ ७४ ॥ न करना उसका संग । नहीं भोगना वही भोग । नहीं चलना वही मार्ग । चलता वह ॥ ७५ ॥ नहीं सुनना वही सुनता । नहीं बोलना वही बकता । इतने पर भी न देखता । इसमें दोष ॥ ७६ ॥ तन-मनको जो रुचता । कृत्य-अकृत्य न देखता । कर्तव्य मानके करता । असंगत सारा ॥ ७७ ॥ इससे पाप भी होगा । नरक-क्लेश भी होगा । यह कुछ न देखेगा । भविष्यका जो ॥ ७८ ॥ इसके संगतिसे अज्ञान । होता है इतना बलवान । ज्ञानसे जो उतरता जान । संघर्ष रत हो ॥ ७९ ॥ रहने दो अब यह अर्जुन । दिखाता हूं अज्ञान मूर्तिमान । इससे मानेगा तू वह पूर्ण । सही रूपसे ॥ ७८० ॥ ज्ञानेश्वरी ४९४